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Sunday, 18 November 2018

गुर्जर घार के प्राचीन जनपद

गुर्जर घार भाग 3 -
लेखक -इंजी. राम प्रताप सिंह
कुतवार जनपद परिचय एतिहासिक और कथात्मक तथा साहित्यात्मक कुतवार का महत्व काफी महान है विगत ज्ञात तथा लिखित इतिहास के तर्क वितर्क में ना फस के  हम सिर्फ कुतवार के सभी विवरणों को इसमे लेंगे कुतवार, कोटवार ,कुन्तलपुर, कोटबार, कुन्तिभोज  के नामो से इतिहास में प्रसिद्ध प्राचिन जनपद का इतिहास गौरव का रहा है जिसमे कुतवार की वर्तमान स्थति यह आसन नदी के तट पर स्थित है और ग्वालियर से 20 मील है और बानमोर मुरैना से 16किलोमीटर दूर है । कांतिपुरी जो प्राचीन पद्मावती के निकट ही स्थित थी गुप्तकाल में  नागराजाओं के अधिकार में थी।  विष्णुपुराण 4,24,64 में पद्मावती में नागराजाओं का उल्लेख है। कांतिपुरी के कुंतीपुरी , कुंतीपद, और कुंतलपुरी नाम भी मिलते हैं। पांडवों की माता कुंती संभवत: इसी नगरी के राजा कुंतिभोज की पुत्री थी इसके अतिरिक्त कुंती भोज का विवरण महाभारत "शिरॊ ऽभूथ थरुपथॊ राजा महत्या सेनया वृतः, कुन्तिभॊजश च चैथ्यश च चक्षुष्य आस्तां जनेश्वर "Mahabharata (VI.46.45) लेकिन हमको कुंती भोज ही मिलता है इसकी प्राचीनता हम उस जगह पे जाकर देख सकते हैं "द्रविडाः सिंहलाश चैव राजा काश्मीरकस तदा, कुन्तिभॊजॊ महातेजाः सुह्मश च सुमहाबलः Mahabharata (II.31.12)" हमे कुंतीभोज के कुशल राज्य का पता लगता है "नवराष्ट्रं विनिर्जित्य कुन्तिभॊजम उपाथ्रवत, परीतिपूर्वं च तस्यासौ परतिजग्राह शासनम Mahabharata (II.28.6)"कुंती के पिता कुंति भोज ने राजधानी कुंतलपुर में आसन नदी के किनारे अपनी पुत्री के लिए बनवाया था,इसी मंदिर के किनारे कुंती ने सूर्य देव की कृपा से महाभारत युद्ध के महारथी कर्ण को जन्म दिया लोकलाज से बचने के लिए  इसी मंदिर के किनारे बने घाट से सोने की पेटी में कवच-कुंडलों के साथ कर्ण को सुरक्षित रख कर नदी में बहा दिया था। आसन नदी के के किनारे आज भी पत्थरों पे रथ तथा घोड़ों के निसान मौजूद हैं ।कुंती भोज की महाभरत के युद्ध मव हत्या के बाद कुतवार का साहित्यक अता पता नही लगता है । अपितु ऐतिहासिक काल का उद्गम नाग वंश और वंसफ़र गुर्जर और कुषाण गुर्जर काल मे निकलता है ,कनिघम के अनुसार कुतवार पे प्रारमब्भिक समय मे  नाग वंश ने वंसफ़र के अधीन सत्ता संभाली और उसके बाद ये कुसानो के अधीन आ गये जिस के चलते नागों ने अपने दूर गामी राज्य पवाया ,विदिशा, और मथुरा से संपर्क बना लिए जिसके चलते इनके कुतवार पे भारशिव का उदय होता है  140ईसा में जिसके बाद

नवा नाग जिसकी उम्र के 27 वर्ष में उसने नवा नाग वंश की स्थापना की थी, भारशिव (140-170 इस्वी ),वीरसेन 170-210 अपनी उम्र के 34 साल में  ये मथुरा और कुतवार की साझी सत्ता के संपर्क स्थापित किये इसने ,हया नाग(210-245) ,ट्राय नाग(245-250 )बरहिना नाग (250-260),चराज नाग ( 30 साल) (260-290)भाव नाग (290-315 इस्वी ),रुद्रसेन नाग (315-344 इस्वी )          शेष अगली भाग में जारी..............

ग्वालियर एक परिचय

गुर्जर घार भाग 4-
लेखक- इंजी.राम प्रताप सिंह 

ग्वालियर को गुर्जर सम्राज्य के बाद गुर्जर घार के नाम से जाना जाने लगा था , ग्वालियर नगर और क्षेत्र का प्राचीनतम नाम गोपराष्ट्र मिलता है। पहले यह गोपराष्ट्र चेदि जनपद के अंतर्गत था। कालांतर में यह स्वतंत्र जनपद हो गया है। उस समय जनपद का अर्थ राष्ट्र के रूप में प्रयोग होने लगा।
इसके चारों ओर जनपद थे जिसमे, सूरसेन चेदि, निषध, आदि राष्ट्र थे। ग्वालियर का सर्वाधिक प्राचीन उल्लेख मार्कण्डेय पुराण में गोवर्धनपुरम्‌, मानसिंह तोमर (1489-1510 ई.) के शिलालेख में"गोवर्धनगिरि"  सन्‌ 525 ई. के "मातृचेट" शिलालेख में "गोपाह्य" के नाम से मिलता है। मिहिरकुल के राज्य के पंद्रहवें वर्ष (सन्‌ 527 ई.) में यहाँ के गढ़ को गोपमूधर, दसवीं शताब्दी में गुर्जर प्रतिहारों के शिलालेख में गोपाद्रि तथा गोपागिरि, रत्पनाल कच्छपघात के लगभग 1115 ई. के शिलालेख में गोपाद्रि तथा गोपागिरि, रत्नपाल कच्छपघात के लगभग 1115 ई. के शिलालेख में "गोपक्षेत्र" विक्रम संवत्‌ 1150 ई. के शिलालेख में गोपाद्रि तथा अनेक शिलालेखों में "गोपाचल" "गोपशैल" तथा "गोपपर्वत" वि.सं. 1161 के शिलालेख में गोपलकेरि, ग्वालियर खेड़ा कहा गया है।अपभ्रंश भाषा में कवियों ने इस दुर्ग को "गोपालगिरि, गोपगिरि, गोव्वागिरि"कहा है। हिंदी में सबसे पहले सन्‌ 1489 में कवि मानिक ने "ग्वालियर" संज्ञा का प्रयोग किया है। तुर्क इतिहासकारों ने गालेवार या गलियूर लिखा है।मराठी में "ग्वाल्हेर" कहते हैं। कश्मीर के सुल्तान नेतुल आवेदीन के  राजकवि जीवराज ने "गोपालपुर"के नाम से संबोधित किया है।भट्टारक सुरेंद्र कीर्ति ने सं. 1740 में रचि रविव्रत कथा में ग्वालियर को गढ़ गोपाचल लिखा है- "गढ़गोपाचल नगर भलो शुभ शानो" साथ ही अनेक जैन ग्रंथ प्रशस्तियों में एवं जैन प्रतिमा प्रशस्तियों में गोपाचल दुर्ग, गोपाद्रौ, गोयलगढ़, गोपाचल आदि नामों का अधिकतम उल्लेख मिलता है। ग्वालियर में मौजूद ग्वालियर किले का निर्माण 8वीं शताब्दी में किया गया था. तीन वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैले इस किले की ऊंचाई 35 फीट है. यह किला मध्यकालीन स्थापत्य के अद्भुत नमूनों में से एक है. यह ग्वालियर शहर का प्रमुख स्मारक है जो गोपांचल नामक छोटी पहाड़ी पर स्थित है. लाल बलुए पत्थर से निर्मित यह किला देश के सबसे बड़े किले में से एक है और इसका भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान है.बहुत समृद्ध है ग्वालियर के किले का इतिहास इतिहासकारों के दर्ज आंकड़े में इस किले का निर्माण सन 727 ईस्वी में सूर्यसेन नामक एक स्थानीय सरदार ने किया जो इस किले से 12 किलोमीटर दूर सिंहोनिया गांव का रहने वाला था. इस किले पर कई  राजाओं ने राज किया है. किले की स्थापना के बाद करीब 989 सालों तक इस पर गुर्जर वंश ने राज किया जिसके गुर्जर साम्राट देवराज, वत्सराज, ककुस्थ, रामभद्र, मिहिरभोज महान गुर्जर सम्राट, महिपाल गुर्जरेंद्र, महेन्द्रपाल आदि गुर्जर वंश के राजाओं ने ग्वालियर पर 250 साल राज किया जिसकी जानकारी हमे ग्वालियर प्रस्सति और ,सागर ताल अभिलख से मिलती है ,गुर्जर सम्राट मिहिर भोज महान की बनाई गयी तेली का मंदिर , सास बहु का मंदिर ,चतुर्भुज मंदिर बनबाई गए थे आदि का निर्माण बन बाये थे । इसके बाद इस पर प्रतिहार वंश ने राज किया. 1023 ईस्वी में मोहम्मद गजनी ने इस किले पर आक्रमण किया लेकिन उसे हार का सामना करना पड़ा. 1196 ईस्वी में लंबे घेराबंदी के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक ने इस किले को अपनी अधीन किया लेकिन 1211 ईस्वी में उसे हार का सामना करना पड़ा. फिर 1231 ईस्वी में गुलाम वंश के संस्थापक इल्तुतमिश ने इसे अपने अधीन किया इसके बाद मानसिंह तोमर ने अपने कब्जे में कर लिया था  (1486-1516) जिन्होंने अपनी पत्नी मृगनयनी के लिए गूजरी महल बनवाया. 1398 से 1505 ईस्वी तक इस किले पर तोमर वंश का राज रहा.मानसिंह ने इस दौरान इब्राहिम लोदी कीअधीनता  स्वीकार ली थी. लोदी की मौत के बाद जब मानसिंह के बेटे विक्रमादित्य को हुमायूं ने दिल्ली दरबार में बुलाया तो उन्होंने आने से इंकार कर दिया. इसके बाद बाबर ने ग्वालियर पर हमला कर इसे अपने कब्जे में लिया और इसपर राज किया. लेकिन शेरशाह सूरी ने बाबर के बेटे हुमायूं को हराकर इस किले को सूरी वंश के अधीन किया. शेरशाह की मौत के बाद 1540 में उनके बेटे इस्लाम शाह ने कुछ समय के लिए अपनी राजधानी दिल्ली से बदलकर ग्वालियर कर दिया. इस्लाम शाह की मौत के बाद उनके उत्तराधिकारी आदिल शाह सूरी ने ग्वालियर की रक्षा का जिम्मा हेम चंद्र विक्रमादित्य (हेमू) को सौंप खुद चुनार चले गए. हेमू ने इसके बाद कई विद्रोहों का दमन करते हुए कुल 1553-56 के बीच 22 लड़ाईयां जीतीं. 1556 में हेमू ने ही पानीपत की दूसरी लड़ाई में आगरा और दिल्ली में अकबर को हराकर हिंदू राज की स्थापना की. इसके बाद हेमू ने अपनी राजधानी बदलकर वापस दिल्ली कर दी और पुराना किला से राज करने लगा.इसके बाद अकबर ने ग्वालियर के किले पर आक्रमण कर इसे अपने कब्जे में लिया और इसे कारागर में तब्दील कर दिया गया. मुगल वंश के बाद इसपर राणा और जाटों का राज रहा फिर इस पर मराठों ने अपनी पताका फहराई.1736 में जाट राजा महाराजा भीम सिंह राणा ने इस पर अपना आधिपत्य जमाया और 1756 तक इसे अपने अधीन रखा. 1779 में सिंधिया कुल के मराठा छत्रप ने इसे जीता और किले में सेना तैनात कर दी. लेकिन इसे ईस्ट इंडिया कंपनी ने छीन लिया. फिर 1780 में इसका नियंत्रण गौंड राणा छत्तर सिंह के पास गया जिन्होंने मराठों से इसे छीना. इसके बाद 1784 में महादजी सिंधिया ने इसे वापस हासिल किया. 1804 और 1844 के बीच इस किले पर अंग्रेजों और सिंधिया के बीच नियंत्रण बदलता रहा. हालांकि जनवरी 1844 में महाराजपुर की लड़ाई के बाद यह किला अंततः सिंधिया के कब्जे में आ गया.
शेष अगले भाग में

गुर्जर घार की सीमा

गुर्जर घार भाग 5-
लेखक- इंजी. राम प्रताप सिंह
गुर्जर घार की भौगोलिक स्थिति वर्तमान का आगरा , मुरैना ,गोहद, ग्वालियर, श्योपुर, सबलगढ़ ,धौलपुर, प्राचीन पवाया, प्राचीन कुन्तलपुर, प्राचीन सिहोनिया,पूर्व  भड़ानक राज्य की सरहद,  फतेहाबाद ,करकोली आदि ये गुर्जर घार के हिस्से थे जिसमें  बारे में ये कहना है कि चम्बल नदी गुर्जर घार को बांटती थी जिसमे विभिन्न नदियां हैं वर्तमान फतेहाबाद तथा फिरोजाबाद तहसील में यमुना के दोनों तरफ लगभग गुर्जरों के 60 गाँव हैं, तथा स्थानीय बोलचाल में इस 60 गाँव के क्षेत्र को गूजरघार कहा जाता हैं, जिसका अर्थ हैं - गूजरों का घर|फतेहाबाद कस्बे के पश्चिम में भरापुर गूजराघार का पहला गाँव हैं, इसके पूर्व में यमुना किनारे तक करीब 21 गाँव हैं तथा यमुना पार फिरोजाबाद तहसील में  करीब 38 गाँव गुर्जरों के हैं|
 फतेहबाद तथा फिरोजाबाद की ताल्लुकेदार होने के नाते ये सभी गाँव चौधरी लक्ष्मण सिंह की ताल्लुकेदारी में आते थे जिनकी रियासत का प्रारम्भ गुर्जर घार से होता था तथा करकोली के जमींदार चौधरी फतेह सिंह की जमींदारी आती थी।

गुर्जर घार हुण गुर्जर

गुर्जर_घार भाग 6-. गुर्जर घार हुण गुर्जरों की सत्ता
लेखक -इंजी. राम प्रताप सिंह
गुर्जर , हूण राजवंश को गुर्जर राजवंश की ही सत्ता के रूप में जाना जाता है इस मत के अनुसार विदित सभी इतिहासकारों ने एक मत जबाब दिए जिसके अनुसार हुण गुर्जर थे , बुहलर, होर्नले, वी. ए. स्मिथ, विलियम क्रुक आदि इतिहासकारो ने गुर्जरों को श्वेत हूणों से सम्बंधित माना हैं|  कैम्पबेल और डी. आर. भंडारकर गुर्जरों की उत्पत्ति श्वेत हूणों की खज़र शाखा से बताते हैं| भारत में आज भी ‘हूण’ गुर्जरों का एक प्रमुख गोत्र हैं जिसकी आबादी अनेक प्रदेशो में हैं| मिहिरकुल तोरमाण के सभी विजय अभियानों हमेशा उसके साथ रहता था। उसके शासन काल के पंद्रहवे वर्ष का एक अभिलेख ग्वालियर एक सूर्य मंदिर से प्राप्त हुआ हैं| इस प्रकार हूणों ने मालवा इलाके में अपनी स्थति मज़बूत कर ली थी| उसने उत्तर भारत की विजय को पूर्ण किया और गुप्तो सी भी नजराना वसूल किया| मिहिरकुल ने पंजाब स्थित स्यालकोट को अपनी राजधानी बनाया|मिहिकुल हूण एक कट्टर शैव था। उसने अपने शासन काल में हजारों शिव मंदिर बनवाये| मंदसोर अभिलेख के अनुसार यशोधर्मन से युद्ध होने से पूर्व उसने भगवान स्थाणु (शिव) के अलावा किसी अन्य के सामने अपना सर नहीं झुकाया था। मिहिरकुल ने ग्वालियर अभिलेख में भी अपने को शिव भक्त कहा हैं| मिहिरकुल के सिक्कों पर जयतु वृष लिखा हैं जिसका अर्थ हैं- जय नंदी| वृष शिव कि सवारी हैं जिसका मिथकीय नाम नंदी हैं| जैन ग्रन्थ कुवयमाल के अनुसार तोरमाण चंद्रभागा नदी के किनारे स्थित पवैय्या  नगरी से भारत पर शासन करता था| यह पवैय्या नगरी ग्वालियर के पास स्थित थी| जिसमे मिहिर गुल के ग्वालियर प्रस्सति अभिलेख में समस्त विवरण १. [*][*ज](य)ति जलदवालध्वान्तम् उत्सारयन् स्वैःकिरणनिवहजालैर् व्योम विद्योतयद्भिःउ[*दय-गिरितटाग्रं] मण्डय{+न्} यस्तुरंगैःचकितगमनखेदभ्रान्तचंचत्सटान्तैः। उदयगिरि

२. [⏑--](ग्र)स्तचक्रो र्त्तिहर्त्ताभुवनभवनदीपः शर्व्वरीनाशहेतुःतपितकनकवर्ण्णैर् अंशुभिf पंकजानामभिनवरमणीयं यो (वि)धत्ते स वो व्याट्।श्रीतोरमाण इति यः प्रथितो

३. [*?भू-च](?क्र)पः प्रभूतगुणःसत्यप्रदानशौर्याद् येन मही न्यायत(शा)स्तातस्योदितकुलकीर्त्तेः पुत्रो तुलविक्रमः पतिः पृथ्व्याःमिहिरकुलेति ख्यातो भंगो यः पशुपति(म् अ)[आर्रयार्रय्

४. [*तस्मिन् रा]जनि शासति पृथ्वीं पृथुविमललोचने र्त्तिहरेअभिवर्द्धमानराज्ये पंचदशाब्दे नृपवृषस्य।शशिरश्मिहासविकसितकुमुदोत्पलगन्धशीतलामोदेकार्त्तिकमासे प्राप्त गगन

५. [*?पतौ] निर्मले भाति।द्विजगणमुख्यैर् अभिसंस्तुते च पुण्याहनादघोषेणतिथिनक्षत्रमुहूर्त्ते संप्राप्ते सुप्रशस्तद्(इ)ने।मातृतुलस्य तु पौत्रः पुत्रश् च तथैव मातृदासस्यनाम्ना च मातृचेतः पर्व्व-

६. [*त][-⏑][*?पु](र)वास्(त्)अव्(य्)अःनानाधातुविचित्रे गोपाह्वयनाम्नि भूधरे रम्येकारितवान् शैलमयं भानोः प्रासादवरमुख्यं।पुण्याभिवृद्धिहेतोर् म्मातापित्रोस् तथात्मनश् चैववसता च गिरिवरे स्मि राज्ञः

७. [...](?पा)देनये कारयन्ति भानोश् चन्द्रांशुसमप्रभं गृहप्रवरंतेषां वासः स्वर्ग्गे यावत्कल्पक्षयो भवति॥भक्त्या रवेर् व्विरचितं सद्धर्म्मख्यापनं सुकीर्त्तिमयंनाम्ना च केशवेति प्रथितेन च{-।}

८. [...](?दि)त्येन॥यावच्छर्व्वजटाकलापगहने विद्योतते चन्द्रमादिव्यस्त्रीचरणैर् व्विभूषिततटो यावच् च मेरुर् नगःयावच् चोरसि नीलनीरदनिभे विष्णुर् व्विभर्त्य् उज्वलांश्रीं{-स्} तावद् गिरिमूर्ध्नि तिष्ठति

९. [*?शिला-प्रा]सादमुख्यो रमे॥ ग्वालियर क्षेत्र में हूणों का आधिपत्य था| हूण सम्राट मिहिरकुल के शासन काल के पंद्रहवे वर्ष का एक अभिलेखग्वालियर के पास से एक सूर्य मंदिर से प्राप्त हुआ हैं| ग्वालियर जिले की डबरा तहसील में भारस हूण गुर्जरों का प्रमुख गाँव हैं| आज भी चंबल संभागग्वालियर तथा इसके समीपवर्ती जिलो के गुर्जर बाहुल्य अनेक गाँवो में हूण गुर्जरों की बिखरी  आबादी हैं| ग्वालियर की डबरा तहसील में भारस हूण गुर्जरों का मुख्य गाँव हैं| भरास के पास ही चपराना गुर्जरों का बडेरा गाँव हैं| दोनों गोंवो के लोग पग-पलटा भाई माने जाते हैं तथा आपस में शादी नहीं करते| मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में नरवर के पास डोंगरी, और टिकटोली हूण गुर्जरों का प्रसिद्ध गाँव हैं|  शेष अगले भाग में जारी............।

गुर्जर सम्राट मिहिर भोज

सदी के गुमनाम महानायक मिहिर भोज !

सदी के गुमनाम महानायक मिहिर भोज !
मिहिर भोज ,महाराष्ट्र गुर्जर समाज
लेखिका -ज्योति नरेंद्र पाटिल समाजसेवी
एक हज़ार साल आर्यव्रत पर राज करने बाले गुर्जरों में एक से बढ़कर एक राजा महाराजा क्रांतिकारी हुए हैं , जिन्होंने खून पसीने से देश दुनिया की भूमि को रहने योग्य बनाया था जिसमे बीहड़ उबड़ खाबड़ जमीनों को उपयोगी बनाने के लिए गुर्जरों ने पूरे एक हज़ार साल के लगभग राज किया जिनमें हर एक गोत्र के गुर्जरों का अत्यधिक योगदान रहा है शक कुसान हुण मोरी गुर्जर प्रतिहार चालुक्य भड़ाना खटाना घुरैया और बैसला आदि ने राज किया है जिन्होंने भारत को ज्ञान तथा शिक्षा में सात वे आसमान पर पहुँचा दिया था ,गुर्जरों के हर एक राजवंश में शिक्षा को काफी जोर दिया तथा अंधकार को दूर करने में आडम्बर को मिटाने ने के लिए काफी हद तक सफलता शक और कुशाण को हासिल भी रही थी गुर्जर सम्राट मिहिर भोज का नाम भारत ही नही आर्यवृत के महान सम्मानों में गिना जाता है इसके अतिरिक्त प्रभास ,परमेश्वर, श्रीमदादिवरह उपाधियां से गुर्जर सम्राट की सोभा भारत के चक्रबर्ती सम्राट अशोक महान , कनिष्क महान गुर्जर के बाद गुर्जर  सम्राट मिहिर भोज का नाम आता है ,गुर्जर प्रतिहार वंश की स्थापना नागभट्ट नामक एक सामन्त ने 725 ई. में की थी। उसने राम के भाई लक्ष्मण को अपना पूर्वज बताते हुए अपने वंश को सूर्यवंश की शाखा सिद्ध किया। अधिकतर गुर्जर सूर्यवंश का होना सिद्द करते है तथा गुर्जरो के शिलालेखो पर अंकित सूर्यदेव की कलाकृर्तिया भी इनके सूर्यवंशी होने की पुष्टि करती है।आज भी राजस्थान में गुर्जर सम्मान से मिहिर कहे जाते हैं, जिसका अर्थ सूर्य होता है गुर्जर सम्राट मिहिर भोज से अरब , पाल ,कश्मीर के वर्मन वंशी आदि थर-थर कांपते थे !
मिहिर भोज के पहले राज्य स्थिति-
वत्सराज का उत्तराधिकारी नागभट्ट द्वितीय (800-834) भी अपने कुल का एक प्रतापी सम्राट् था। नागभट्ट को अपने सैन्य-जीवन के प्रारम्भ में कई सफलतायें प्राप्त हुई। नागभट्ट-द्वितीय को इस बात के लिए श्रेय प्रदान किया जाता है कि उसने उत्तर में सिन्ध से लेकर दक्षिण में आन्ध्र और पश्चिम में अनर्त (काठियावाड़ में एक स्थान) से लेकर पूर्व में बंगाल की सीमाओं तक अपने राज्य का विस्तार किया। यद्यपि राष्ट्रकूट वंश के राजा गोविन्द तृतीय ने नागभट्ट-द्वितीय को पराजित कर दिया तथापि कन्नौज पर प्रतिहार वंश का अधिकार बना रहा। नागभट्ट-द्वितीय को गोविन्द-तृतीय द्वारा पराजय सहन करने से कुछ हानि अवश्य उठानी पडी किन्तु कन्नौज को उसने अपने हाथ से नहीं जाने दिया और इसे अपनी राजधानी बनाया। नागभट्ट-द्वितीय का उत्तराधिकारी रामभद्र था (834-840), जिसके शासन-काल में कोई महत्त्वपूर्ण घटना घटित नहीं हुई।
रामभद्र के समय गुर्जर राजाओं से गुजरात,मुंगेर , भोजपुर ,पंजाब,आदि राज्य लगभग लगभग नाम मात्र के अधीन थे जिसमें विद्रोह के स्वर गूंज रहे थे

मिहिर भोज का साम्राज्य-
गुर्जर साम्राज्य 

मिहिर भोज के समय गुर्जर वंश का चौमुखी विकाश हुआ था जिसमे गुर्जर सम्राट मिहिर भोज के राज्य शीमा मुल्तान ,सिंध से लेकर बंगाल तक जा लगी और पंजाब और कश्मीर की सरहद से लेके महाराष्ट्र तक जा चुकी थी इसके अलावा मुंगेर, आसाम , उड़ीसा,उत्तराखण्ड आदि इनके साम्राज्य का हिस्सा बन गए थे ।

मिहिर भोज की उपाधियां-गुर्जर सम्राट मिहिर भोज के मुख्य मुख्य अभिलेखों में ग्वालियर, पेहोवा, दौलतपुर, अभिलेख हैं जिनमे मिहिर भोज के नाम के साथ मिहिर,भोज देव, प्रभाश, आदिवराह, परमेश्वर, आदि महान महान उपाधियों से बिभुसित किया गया था ।

मिहिर भोज का पारिवारिक विवरण-

1-नागभट्ट (730-760 ईसवी),
2-ककुस्थ और देवशक्ति (760-778इस्वी) ,
3-वत्सराज (778-800इस्वी ) ,
4-नागभट्ट 2 (800-833इस्वी ) ,
5-रामभद्र (833-835इस्वी ) ,
6- सम्राट मिहिर भोज(835-889 इस्वी)
7-सम्राट महेन्द्रपाल प्रथम(885-910इस्वी) ,
8- सम्राट महिपाल (910-930इस्वी),
9-भोज द्वतीय (930-931),
10-विनायकपाल (931-944इस्वी),
11-महेन्द्रपाल द्वतीय (944-947ई.),
12-देवपाल (947-955इस्वी),
13-विजयपाल(955-985इस्वी),
14-राज्यपाल देव गुर्जर(985-1019),
15-त्रिलोचलपाल गुर्जर(1019-1030इस्वी),
16-यशपाल गुर्जर (1030-1040इस्वी ),  कुल 300 साल आर्यवृत पर गुर्जर वंश के इस परिवार ने राज किया था

मिहिर भोज के सामन्त-

1-चाटसु के गुहिल,
2-शाकंभरी के चाहमान ,
3-मारवाड़ के प्रतिहार ,
4-प्रताप गढ़ के चौहमान ,
5-सौराष्ट्र के चालुक्य ,
6-बुंदेलखंड के चंदेल गुर्जर ,

मिहिर भोज का शासन काल-भोज ने सर्वप्रथम कन्नौज राज्य की व्यवस्था को चुस्त-दुरूस्त किया, प्रजा पर अत्याचार करने वाले सामंतों और रिश्वत खाने वाले कामचोर कर्मचारियों को कठोर रूप से दण्डित किया। व्यापार और कृषि कार्य को इतनी सुविधाएं प्रदान की गई कि सारा साम्राज्य धनधान्य से लहलहा उठा। मिहिरभोज ने गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य को धन, वैभव से चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया। अपने उत्कर्ष काल में इन्हे गुर्जर सम्राट मिहिर भोज की उपाधि मिली थी। अनेक काव्यों एवं इतिहास में उसे गुर्जर सम्राट भोज, भोजराज, वाराहवतार, परम भट्टारक, महाराजाधिराज आदि विशेषणों से वर्णित किया गया है।विश्व की सुगठित और विशालतम सेना भोज की थी-इसमें 8,00,000 से  ज्यादा पैदल करीब 90,000 घुडसवार,, हजारों हाथी और हजारों रथ थे।915 ईस्वीं में भारत आए बगदाद के इतिहासकार अल- मसूदी ने अपनी किताब मरूजुल महान मेें भी मिहिर भोज की 36 लाख सेनिको की पराक्रमी सेना के बारे में लिखा है। इनकी राजशाही का निशान “वराह” था और मुस्लिम आक्रमणकारियों के मन में इतनी भय थी कि वे वराह यानि सूअर से नफरत करते थे। मिहिर भोज की सेना में सभी वर्ग एवं जातियों के लोगो ने राष्ट्र की रक्षा के लिए हथियार उठाये और इस्लामिक आक्रान्ताओं से लड़ाईयाँ लड़ी।मिहिरभोज के राज्य में सोना और चांदी सड़कों पर विखरा था-किन्तु चोरी-डकैती का भय किसी को नहीं था। जरा हर्षवर्धन के राज्यकाल से तुलना करिए। हर्षवर्धन के राज्य में लोग घरों में ताले नहीं लगाते थे,पर मिहिर भोज के राज्य में खुली जगहों में भी चोरी की आशंका नहीं रहती थी। मिहिर भोज की सेना में हर जाति वर्ग का इंसान सेना में लड़ने जाता था जिसमे तमोली, तेली, माला बुनकर, लुहार, आदि सभी भाग लेते थे भोज के राज कॉज में अरब यात्री ने भोज के राज्य का वर्णन में लिखता है कि "इस राजा के राज्य में सुकून से जीते थे और अपने घरों में ताला नही लगाते थे" मिहिर भोज ने अपनी सेना को पहले से और बेहत्तर बनाने के लिए सेना की टुकड़ियों को अलग अलग दिशाओं में राष्ट्रकूट से लड़ने के लिए चुंगी मांडू पुर बना दी थी , पाल से लड़ने के लिए मुंगेर सरहद पर, कश्मीर के वर्तमान वंसज से लड़ने के लिए पेहोवा में बना दी थी , अरब के तरफ से होने बाले हमलों की मिहिर भोज अपनी अगुवाई में खुद अंजाम देते थे इनके बारे में कहा गया था कि ये "अरब यात्री सुलेमान और मसूदी ने अपने यात्रा विवरण में लिखा है ’जिनका नाम बराह (मिहिर भोज) है। उसके राज्य में चोर डाकू का भय कतई नहीं है। उसकी राजधानी कन्नौज भारत का प्रमुख नगर है जिसमें 7 किले और दस हजार मंदिर है। आदि बराह का (विष्णु) का अवतार माना जाता है। यह इसलाम धर्म और अरबों का सबसे बड़ा शत्रु है"

अरबों के साथ संघर्ष -मिहिर भोज के राजतिलक के बाद अरबों के ऊपर अंधकार के काले बादल छगये थे जिसके चलते राज्य के विरोध अरब आक्रमण कारी अरमान ने दुगनी फ़ौज का उपयोग किया 839 इस्वी में और सिंध में बुरी तरह उसको पराजित होकर भागना पड़ा  अरब के खलीफा मौतसिम वासिक, मुत्वक्कल, मुन्तशिर, मौतमिदादी थे। अरब के खलीफा ने इमरान बिन मूसा को सिन्ध के उस इलाके पर शासक नियुक्त किया था। जिस पर अरबों का अधिकार रह गया था लेकिन इनकी मोत के बाद अरमान गद्दी पर आया और गुर्जर के हातो पराजित होकर सिंध से बेदखल होकर भाग गया मिहिर भोज ने इसी प्रकार 840 से 885 तक इनको 20 बार युद्ध के मैदान में बुरी तरह पराजित कर के अपने राज्य तथा राज्य के लोगों  को बचाया नारायण का अवतार की तरह ।

पाल वांशियों के साथ संघर्ष - पाल वंश में धर्म पाल ,नारायण पाल ,देबपाल में साथ मिहिर भोज के काफी युद्ध हुए देबपाल तथा नारायण पाल की सत्ता पूर्ण खत्म करके बंगाल उड़ीसा को अपने मे मिला लिया था ।

राष्ट्रकूटों के साथ संघर्ष- अमोघवर्ष ,तथा उसके पुत्र के साथ निरंतर युद्ध उज्जैन तथा कन्नौज के लिए किए जा रहे थे कृष्ण 2 को युद्ध से हरा कन्नौज से बेदखल कर दिया था इसके इससे पहले नर्मदा तट पर हुए मिहिर भोज और अमोघवर्ष के साथ हुए युद्ध अनिर्णायक रहे थे ।


मिहिर भोज के सिक्के- 
श्रीमद आदिवराह 

मिहिर भोज के कन्नौज विजय के बाद राजतिलक में निसानी के तौर पर श्रीमद आदिवराह नामक 56 ग्रेन के सिक्के को चलाया था जो उस जमाने का उत्तम टकसाल थी जिसका उपयोग सैनिक वेतन ,बाजार व्यवस्ता आदि के लिए किया जाता था 


मिहिर भोज की कला -
तेली का मंदिर ग्वालियर
मिहिर भोज ने विंष्णु ,शिव,के मंदिर सबसे ज्यादा बन बाए थे जिनमें ,बटेस्वर मुरैना,तेलीका मन्दिर, सास बहू का मंदिर ,
चतुर्भुज मंदिर, जयपुर दोसा की बाबड़ी, आदि मंदिरों का निर्माण कराया था ।मिहिर भोज ने भारत भूमि के उत्तम स्थान आर्यवृत पर लगभग 55साल राज किया तथा गुर्जर प्रतिहार के इस वंश ने भारत भूमि का भोग 300 साल तक किया जिसमें भारत को सोने की चिड़िया बना दिया गया था ।
मिहिर भोज अपने दरबार मे एक एक श्लोक पर लाख लाख मुद्रा भेंट करता था राज्य की विशालता आप नाप सकते हैं कि मिहिर भोज का राज्य किस शिखर पर था आज उस महान सम्राट की जयंती तथा अवतरण दिवश है जिसपे कम से कम हम उनके आदर्शों पर चल कर हम भी जीवन की कठिनता को पार करके अपना कर्तिमान कायम कर सकते हैं जिसके लिए हिम्मत ,संयम आदि की जरूरत होती है ।
हर हर भोज
घर घर भोज
जय कनिष्क जय मिहिरगुल जय भोज ।

बलराम गुर्जर राजगढ़

 गुर्जर गौरव पूर्व विधायक श्री बलराम गुर्जर जी को जन्म दिन की लाखों बधाई भगवान उनको लंबी उम्र दे इनके पुत्र श्री जसवंत सिंह जी सामाजिकता के दायरे में पूर्व विधायक श्री बलराम जी गायरी गुर्जर ओर लोर गुर्जरों का एरिया है जिसके आस पास काफी ज्यादा मात्रा में गुर्जर हैं 
पूर्व विधायक श्री बलराम 
आज 18/11/18 को बलराम जी का जन्म दिन है । पूर्व विधायक श्री बलराम जी हर वर्ष राजगढ़ और ब्यावरा के गुर्जरों की एक यात्रा निकलते है जिसको बलराम जी या उनके पुत्र वर्तमान राज्यमंत्री श्री जसवंत सिंह गुर्जर देव भगवान की शोभा यात्रा में शामिल होते हैं , इसके साथ ही समाज की आवाज बनते हैं, पिता और पुत्र इसे अतिरिक्त बालराम जी पूर्व विधयक भी राजगढ़ से बने थे औरा उनके पुत्र जिला पंचायत प्रधान हैं ।।

Saturday, 17 November 2018

गूजरी भाषा का इतिहाश

गुजरी भाषा व्याखया -
लेखक -इंजी. राम प्रताप सिंह
कुषाणोँ ने बैक्ट्रीया पर अधिकार किया उसे समय ऊधर ग्रीक सभ्यता तथा लिपी ज्यादा मात्रा मे उपस्थित थी क्योंकि की ग्रीकों के अधीन यह जगह काफी समय सै थी जब कुषाणोँ ने अधिकार किया तो इनकी भाषा की जगह पर आर्य भाषा को लाये जबकी प्रारम्भिक समय मे ईधर खरोष्टी भाषा ही ग्रीक  लिपी मै चलती थी ज्यादा जिसके कुछ समय बाद यह बख्त्री भाषा का उपयोग होने लगा जंहा तक है रोबोटक अभिलेक के अनुसार इनके नामो के वर्णन मे "ओ" को ज्यादा महत्वदिया गया है जिसमे हम इस बात को देखते हैं की यह लोग बोलते कैसे थे उस समय Ozeno (Ujjain), Kozambo (Kausambi), Zagedo (Saketa), Palabotro (Pataliputra) and Ziri-Tambo (Janjgir(ship)-Champa). तथा कनिंघम के अनुसार जिस सिक्के पर कोर्स लिखा है अगर उसे गोर्स (गोर्सी) पढना चाहिये तो kus(a^-)na तो k=G, Gus(a^-)NA इसी क्रम मै आगे इनके सिक्कों पर तथा बी.ऐन.मुख़र्जी के अनुसारKomaro (Kumara) and called Maaseno (Mahasena) and called Bizago (Visakha), Narasao और Miro (Mihara). आदि शब्द इनके सिक्कों पर मिलते हैं जिनके अनुसार वासुदेव को वाजुदेव पढना चाहिये तथा स/श की जगह पर ये लोग "ज" का उपयोग करते थे अब हम कुसान/कुषान पर ध्यान देते हैं "क" को जब कनिंघम ने "ग" बताया है तब आगे "गुजान"(Gujan) जो की गूजर शब्द कि ही अप्रभंस है Komaro (Kumara) and called Maaseno (Mahasena) and called Bizago (Visakha), Narasao और Miro (Mihara). आदि शब्द इनके सिक्कों पर मिलते हैं जिनके अनुसार वासुदेव को वाजुदेव पढना चाहिये तथा स/श की जगह पर ये लोग "ज" का उपयोग करते थे अब हम कुसान/कुषान पर ध्यान देते हैं "क" को जब कनिंघम ने "ग" बताया है तब आगे "गुजान"(Gujan) जो की गूजर शब्द कि ही अप्रभंस है।जी. ए. ग्रीयरसन ने लिंगविस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया, खंड IX  भाग IV में गूजरी भाषा का का विस्तृत वर्णन किया हैं| गूजरों की भाषा गूजरी के बारे मे लिखने बाले सर डेन्जिल इबटसन ने कास्ट एन्ड ट्राइब्स आफ दी पिपुल (पंजाब कास्टस) 1883’’ इनकी भाषा पंजाबी तथा पश्तो सै बिल्कुल भिन्न हिन्दी है जो नरम जुबानी है "इसी भाषा को पूंछ ऐवटाबाद मे बोली जाती है जिसको नरम भाषा गूजरी कहते हैं यही भाषा अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान के सीमा प्रान्त इलाकों मे बहुतायात मे बोली जाती है यह क्षेत्र गुर्जरो के ही अधीन रहा है चाहे वो कसाणा /कुषाण हों या उनके वशंज खटाना या प्रतिहार हों लेकिन इतिहासकारों के अनुसार हूंणों के आगमन के समय इस भाषा का चलन कहा गया है जबकी इसका सम्बन्ध तो बख्त्री सै मिलते हैं | जाहीर  सी बात हे की कुसन वंश के बाद भारत में किसी भी  नयी जाती का आगमन नहीं हुआ हे जिस ने खुद की कोई संस्कृति का विकाश किया हो लेकिन वो सिरफ कुसन वंश ने किया था  जिस का जीता जगता सबूत उनकी भाषा तथा उनके अभिलेख मूर्तिकला आदि भारत में ज़िंदा हैं जिस से इस  का पता लगता हे की यह राजवंश  अपने समय में तररक्कि के किस पथ पे गमन कर रहा था लेकिन गुजरी भाषा के जो प्रमाड कुषाणों के समय में मिलते हैं वो किसी भी समय में नहीं मिलते हैं कुसनो के बाद सबसे बड़ा माइग्रेशन हूणों  का हुआ जिन की कोई भासा नहीं थी अगर हूडों की कोई भाषा होती तो माना जा सकता था की कुसन काल की भासा का इनके साथ कुछ मिलावट होसकती थी मगर ऐसा नहीं हुआ आज भी हम देखें तो कुसन और हूँड़ों के राज करने की जो रियासतें थीं उनमे मूलरूप से गुजरी भाषा का ही चलना हे उत्तरप्रदेश के गुर्जर बहुल एरिया में आज  भी राम राम को रोम रोम बोलै जाता हे,ओ को कॉमन कर के बोलै जाता हे जब आज कुषाण राजवंश को ख़त्म हुए    २००० वर्ष हो चुके हैं लेकिन हमारे लोगों की आज भी वोही भासा हे |  वैसे ही गूजरी बोली  में राम को रोम, पानी को पोनी, गाम को गोम, गया को गयो आदि बोला जाता हैं|इसी  भासा में कुसानो के सिक्कों   उन्हें बाख्त्री में कोशानो लिखा हैं और वर्तमान में गूजरी में  भी ओ को अतिरिक्त जोड़ के  कोसानो बोला जाता हौं| अतः कुषाणों द्वारा प्रयुक्त बाख्त्री भाषा और आधुनिक गूजरी भाषा की समानता भी कुषाणों और गूजरों की एकता को प्रमाणित करती हैं| ​
गुर्जरों की हमेशा ही अपनी विशिष्ट भाषा रही हैं| गूजरी भाषा के अस्तित्व के प्रमाण सातवी शताब्दी से प्राप्त होने लगते हैं| सातवी शताब्दी में राजस्थान को गुर्जर देश कहते थे, जहाँ गुर्जर अपनी राजधानी भीनमाल से यहाँ शासन करते थे| गुर्जर देश के लोगो की अपनी गुर्जरी भाषा और विशिष्ट संस्कृति थी| इस बात के पुख्ता प्रमाण हैं कि आधुनिक गुजराती और राजस्थानी का विकास इसी गुर्जरी अपभ्रंश से हुआ हैं| वर्तमान में जम्मू और काश्मीर के गुर्जरों में यह भाषा शुद्ध रूप में बोली जाती हैं|  जी. ए. ग्रीयरसन ने लिंगविस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया, खंड IX  भाग IV में गूजरी भाषा का का विस्तृत वर्णन किया हैं| इतिहासकारों के अनुसार कुषाण यू ची कबीलो में से एक थे, जिनकी भाषा तोखारी थी| तोखारी भारोपीय समूह की केंटूम वर्ग की भाषा थी| किन्तु बक्ट्रिया में बसने के बाद इन्होने मध्य इरानी समूह की एक भाषा को अपना लिया| इतिहासकारों ने इस भाषा को बाख्त्री भाषा कहा हैं| कुषाणों द्वारा बोले जाने वाली बाख्त्री भाषा और गुर्जरों की गूजरी बोली में खास समानता हैं| कुषाणों द्वारा बाख्त्री भाषा का प्रयोग कनिष्क के रबाटक और अन्य अभिलेखों में किया गया हैं| कुषाणों के सिक्को पर केवल बाख्त्री भाषा का यूनानी लिपि में प्रयोग किया गया हैं| कुषाणों द्वारा प्रयुक्त बाख्त्री भाषा में गूजरी बोली की तरह अधिकांश शब्दों में विशेषकर उनके अंत में ओ का उच्चारण होता हैं| जैसे बाख्त्री में उमा को ओमो, कुमार को कोमारो ओर मिहिर को मीरो लिखा गया हैं, वैसे ही गूजरी बोली  में राम को रोम, पानी को पोनी, गाम को गोम, गया को गयो आदि बोला जाता हैं| इसीलिए कुषाणों के सिक्को पर उन्हें बाख्त्री में कोशानो लिखा हैं और वर्तमान में गूजरी में कोसानो बोला जाता हौं| अतः कुषाणों द्वारा प्रयुक्त बाख्त्री भाषा और आधुनिक गूजरी भाषा की समानता भी कुषाणों और गूजरों की एकता को प्रमाणित करती हैं| हालाकि बाख्त्री और गूजरी की समानता पर और अधिक शोध कार्य किये जाने की आवशकता हैं, जो कुषाण-गूजर संबंधो पर और अधिक प्रकाश डाल सकता हैं|
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