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Thursday, 27 December 2018

प्रतियोगिता का दौर

आजकल कम्पीटिशन का दौर चल रहा है और कोई भी कम्पीटिशन अपने दिमाग की मेहनत से ही जीता जा सकता है लेकिन शातिर दंबग पाखंडी कर्मकांडी दहशतवादी कभी भी सीधे भोले कमेरे किसान हाली पाली कास्तकार बुनकर शिल्पकार कलाकार नट बंजारे भील घुमन्तु अर्घघुमन्तु आदिवासी को उनका अपना दिमाग साम दाम दंड भेद के षड़यंत्र द्वारा काम में ही नहीं लेने देता। इसलिए वो लोग सफल नहीं हो पाते हैं। इसलिए उन्हे भी शातिर दंबग पाखंडी कर्मकांडी दहशत वादी लूटेरे पंडित मुल्ला भोपा बुआ की भांति ही नही उनसे भी तेज अपने दिमाग से ही हर काम बेहतरीन करना होगा।और उन्हे इंट का जवाब पत्थर से देकर उनसे भी आगे बड़ना होगा।जय किसान मजदूर जय जवान जय विज्ञान जय कमेरा इन्सान। दोस्तो दबे कुचले लोग फिल्म मदर इंडिया के किरदार वाले अब जागरुक होकर महाजन की चौपड़ी व ब्राह्मण की खोपड़ी व उनके पालतू लठेतो की हेकड़ी को दर किनार कर चुके है।जो उनके सामंन्तशाही बन्दन थे उन्हे तोड़कर आज समता सम्मानता समता शिक्षा का मैदान फतेह कर चुके है। अब हारा हुआ सामन्तवादी शेर अपने पुराने दिनों को याद कर करके रो रहा है। आज भारतीय जागरूक नागरिक जन्म के अधार की श्रेष्ठता को तरजीह नही दे रहा है। आज कमेरा किसान मजदूर कास्तकार बुनकर शिल्पकार कलाकार कारीगर भील बंजारा घुमन्तु अर्ध घुमन्तु आदिवासी भी अपनी जनसख्या के हिसाब से अपने हक अधिकार के बजट की डिमान्ड कर रहा है। इसलिए लूटेरे दंबग पाखंडी कर्मकांडी दहशतवादी लोगों का भांडा फूट रहा है। उनके पैरो के नीचे की जमीन स खसक रही है। इसलिए उन्हे भारतीय सविधान बुरी लग रही है।एक नागरिक एक मत अधिकार।अब काहेका जन्म के अधार पर श्रेष्ठ नीच होना? सबका सब नाटक है अब बेकार। अब जो काम करेगा उसका पेट भरेगा। जो साम दाम दंड भेद पाखंडवाद कर्मकांड का धन्धा करेगा वो जेल में सडेगा। जय भारत जय सविधान'गर्व से कहो हमारा भारत महान।

Monday, 19 November 2018

चक्रबर्ती सम्राट मिहिर भोज

गुर्जर चक्रबर्ती सम्राट मिहिर भोज की जीवनी 
लेखक-
श्री शोभाराम भाटी
प्रधान संपादक- वर्तमान सत्ता,
इंजी. राम प्रताप सिंह लम्बरदार

मिहिरभोज' गुर्जर प्रतिहार वंश का सर्वाधिक प्रतापी एवं

महान् शासक था। मूल नाम 'मिहिर' था और 'भोज'  उपनाम था। उसका राज्य उत्तर में हिमालय, दक्षिण में नर्मदा, पूर्व में बंगाल और पश्चिम में सतलुज तक विस्तृत था,भोज प्रथम विशेष रूप से भगवान विष्णु के वराह अवतार का उपासक था,इनके साम्राज्य के विवरण भी बड़ा ही सुहाना और  गर्व कराने लायक था

 "इत चम्बल उत बेतवा,मालव सीम सुजान 
दक्छिण दिशि हे नर्मदा ,यह गुर्जर की पहचान"  

"राष्ट्र चाहे जैसा खतरनाक और अंधकार पूर्ण हो ,उसका अंत
दूर और दृस्टि से बाहर क्यों न हो आप  में बल हो और चाहे आप थके हुए हों, आप साहसपूर्वक चले जाइए , परमात्मा पर भरोसा  रखिये और न्याय से काम करते रहिये आपको सफलता मिलेगी, आप लक्च्या या मंजिल पर पहुच ही जायेंगे"" किसी महान व्यक्ति के विचार जो गुर्जर सम्राट के परिचय के साथ लगते हैं  क्यों कि एक महान राज्य का सृजन करने में हिम्मत , शांति,
आत्मज्ञान, धीरज, विस्वाश की जरूरत पड़ती है नही तो इतिहाश बनाने की जगह किरदार इतिहाश में दबा दिए जाते हैं लिकिन मिहिर भोज के पास सब कुछ था परिणाम स्वरूप आज वो ख्याति वान है!
मिहिरभोज गुर्जर राजवंश के सबसे महान राजा माने जाते है। इन्होने लगभग 55 साल तक राज्य किया था। इनका साम्राज्य अत्यन्त विशाल था और इसके अन्तर्गत वे थेत्र आते थे जो आधुनिक भारत के राज्यस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, पंजाब, हरियांणा, उडीशा, गुजरात, हिमाचल,मुलतान, पश्चिम बंगाल और कश्मीर से कर्नाटक आदि राज्यों हैं।

मिहिर भोज विष्णु भगवान के भक्त थे तथा कुछ सिक्कों मे इन्हे 'आदिवराह' भी माना गया है। मेहरोली नामक जगह इनके नाम पर रखी गयी थी।  राष्टरीय राजमार्ग 24 का कुछ भाग गुर्जर सम्राट मिहिरभोज मार्ग नाम से जाना जाता है बिहार का भोजपुर इनके नाम  से जाना जाता है

सम्राट मिहिर भोज ने 836 ईस्वीं से 889 ईस्वीं 54 तक साल तक राज किया। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में सम्राट मिहिर भोज के जीवन के बारे में विवरण मिलता है। गुर्जर सम्राट मिहिर भोज का जन्म सम्राट रामभद्र की महारानी अप्पा देवी के द्वारा सूर्यदेव की उपासना के प्रतिफल के रूप में हुआ माना जाता है मिहिर भोज की  पत्नी का नाम चंद्रभट्टारिका देवी था

मिहिर भोज के सिक्के- गुर्जर प्रतिहार राजाओं के द्वारा चलाये
गए सिक्कों को उस काल में ग्रीक भासा के द्राम के नाम से जाना जाता था अभिलेखों में मिले जानकारी के अनूसार जिसमें कामा ,आहार, सियाडोनि के अभिलेखों के अनुसार गुर्जर प्रतिहार काल में मिहिर भोज के सिक्कों का नाम श्रीमदआदिवराह द्राम के जान से जाना जाता था मिहिर भोज के समय सिक्कों की माप के अनुसार ग्रीक- सासानी सिक्के उस समय ६६ ग्रेन तथा गुर्जर प्रतिहार कालीन सिक्के माप में ६५ ग्रेन के थे जो काफी उत्तम दर्जे के थे [1]
गुर्जर सम्राट मिहिर भोज की विशाल सेना-विश्व की सुगठितऔर विशालतम सेना भोज की थी-इसमें 8,00,000 से  ज्यादा पैदल करीब 90,000 घुडसवार,, हजारों हाथी और हजारों रथ थे 36 लाख की कुल सेना  जिसको चारो दिशाओं में चौकियों पे तैनात कर रखा था एक टुकड़ी पंजाब में तैनात थी जो कश्मीर और अफगानिस्थान की तरफ से होने बाले हमलों के लिए तैयार रहती थी ।दुसरीं टुकड़ी की संभवतः मांडू का गढ़ रहा था जिसको सेना की सरहद मान सकते हैं तीसरी सेना की टुकड़ी बिहार के भोजपुर तथा कन्नौज पर तैनात थी इसके अतिरिक्त अरब से होने बाले हमलों के लिए ऊंट तथा घोड़ों का उपयोग सम्राट की अगुवाई में किया जाता था सेना पर गुर्जर सम्राट राज्य की आय का 50% व्यय करते थे जिसकी बजह से राज्य की विशालता कायम थी 915 ईसवी में भारत आये बगदाद के इतिहासकार ने लिखा है क "गुर्जर राजा के पास 36 लाख सेना थी जो वर्तमान दुनिया की सबसे बड़ी सेना थी"गुर्जर सम्राट की सेना में किसान तथा अन्य सभी भाग लेते थे (2) सागरताल के अभिलेख से मिहिर भोज ने "वाहिनिनापतीन" सब्द का उपुयोग किया जिससे साफ प्रदर्षित होता है कि सेना में एक से अधिक सेनापति ,सेनानायक  होते थे इसने अभिलेखों में "तलक "बलाधिकृत का उल्लेख मिलता है (3)मिहिर भोज की सेना  चार भागों में विभाजित थी पैदल ,अस्व  सेना ,गज सेना ,रथ सेना  तथा अन्य सामन्तों की सेना थी  बलाधिकृत तथा बलाध्यछ  अर्थात सेनापति तथा सेना प्रमुख मुख्य सेना अधिकारी होते थे और सेना की कमान राजा के हात में होती थी गुप्तचर विवस्ता  का अधिकारी दुतपेशनिक होता था ।।

मिहिर भोज की उपाधियां- बेगुमरा ताम्रपत्र से "मिहिर" ग्वालियर प्रसस्ति से "मिहिर"(4) सिक्कों पर उपाधि "आदि बराह "  सीमडोनि गाँव ललितपुर में मिले अभिलेख के अनुसार  नाम "भोज देव"नाम मिलता है (5) , आर्यव्रत सम्राट , विष्णु भक्त  तथा परमेश्वर तथा मिहिर भोज महान का दौलतपुर अभिलेख पूर्ण नाम के साथ है (6) ,परम भट्टारक, महाराजाधिराज ,प्रतिहार आदि उपाधियां हैं ।

सामान्य सव्दों में "मिहिर" तेजवान सूर्य के लिए उपयोग में लाया जाता है अर्थात जो जमीन से आद्रता सोख लेता है ठीक वैसे ही मिहिर अर्थात गुर्जर दुश्मनों की रगों  का खून सामने आने से सोख जाता था ।

मिहिर भोज के सामन्त-
1-गोरखपुर के कलचुरी
2-चाटसु के गुहिल
3-शाकंभरी के चाहमान
4-मारवाड़ के प्रतिहार
5-प्रताप गढ़ के चौहमान
6-सौराष्ट्र के चालुक्य
7-धार के परमार
8-त्रिपुरी के कलचुरी
9-जेजकभुक्ति के चंदेल गुर्जर
10-मंडोर के गुर्जर
11-चंदेरी के गुर्जर प्रतिहार
12-दिल्ली के तंवर गुर्जर
13- राजोरगड के गुर्जर
14-पंजाब के अलखान गुर्जर
15-हाडला के चेदि
16-काठियावाड का बलवर्मन
17-पश्चिमोत्तर प्रदेश के शाही वंश
18-भड़ानक के भड़ाना
19-शिवपुरी के प्रतिहार
20-भड़ोच के चाप/ छावडी/चपराना
इनके अतिरिक्त भी इनके नीचे तथा अन्य छोटे बड़े सामन्त थे सभी सामंतों  का प्रमुख सामंताधिपति होता था जिसका वर्णन गुर्जर राजाओं के अभिलेखों में है ।

मिहिर भोज के अभियान -गुर्जर सम्राट मिहिर भोज को सम्पूर्ण आर्यव्रत का चक्रबर्ती साम्राट कहने के लिए उनका साम्राज्य ही विशालता के शिखर पर था मिहिर भोज के सबसे प्रसिद्ध अभियान सिंध और मुल्तान के अरब के विरुद्ध किये गए थे जिनमें उनको सफलता मिली थी इसके बाद त्रिकोणीय युद्ध मे शामिल होना मिहिर भोज ने त्रिकोणी युद्ध मे शामिल होकर पाल वंश तथा राष्ट्रकूट वंश के अमोघवर्ष को कन्नौज से खदेड़ दिया था इसमे बाद पंजाब के पश्चिम प्रदेश जिसपे कश्मीर के शंकर वर्मन वंश का अधिकार था जिसको समाप्त करके मिहिर भोज ने सम्पूर्ण पंजाब (पेहोवा ) पर कब्जा कर लिया था इसके अतिरिक्त गुजरात , उज्जैन , राजपूताने , कालिंजर मंडल को जीत कर एक समृद्ध राज्य की स्थापना की थी ।

गुजरात की तरफ अभियान- सम्राट मिहिर भोज के काल में गुर्जर साम्राज्य की गुजरात में राज्य सीमा काठियावाड़। हड्डोला शिलालेखों से यह सुनिश्चित होता है कि काठिय़ावाड़ के वर्तमान जिले काठियावाड़ क्षेत्र के प्रमुख शहरों में प्रायद्वीप के मध्य में मोरबी राजकोट, कच्छ की खाड़ी में जामनगर, खंबात की खाड़ी में भावनगर मध्य-गुजरात में सुरेंद्रनगर और वधावन, पश्चिमी तट पर पोरबंदर और दक्षिण में जूनागढ़ हैं। पुर्तगाली उपनिवेश का भाग रहे और वर्तमान में भारतीय संघ में जुड़े दमन और दीव संघ शासित क्षेत्र काठियावाड़ के दक्षिणी छोर पर हैं। सोमनाथ का शहर और मंदिर भी दक्षिणी छोर पर स्थित हैं विजित प्रदेश को  अपने सामन्त बलवर्मन के अधीन था ।

कालिंजर मंडल का अभियान-
पिता रामभद्र के कमजोर प्रशासन की बजह से कालिंजर मंडल उनके हात में रहते हुए भी विद्रोह के परिस्थिति बना रहा था जिसका पता बराह अभिलेख से पता लगता है जिसमे उनहोने परमार वंश तथा चंदेल वंश को पुनः अपना सामन्त नियुक्त किया था ।

कन्नौज के तरफ अभियान -मिहिर भोज के समय कन्नौज काफी उत्तम हालात में प्राप्त नही हुआ था वत्सराज के समय के जिते हुए प्रदेश कन्नौज मुंगेर भोजपुर आदि पर पाल वंशी देवपाल की तरफ से हमले हो रहे थे जिसको समाप्त करने के लिए मिहिर भोज ने

पाल वंश के साथ संघर्ष - देवपाल धर्मपाल का पुत्र एवं पाल वंश का उत्तराधिकारी था। इसे 810 ई. के लगभग पाल वंश की गद्दी पर बैठाया गया था। देवपाल ने लगभग 810 से 850 ई. तक सफलतापूर्वक राज्य किया। उसने 'प्राग्यज्योतिषपुर' (असम), उड़ीसा एवं नेपाल के कुछ भाग पर अधिकार कर लिया था। लेकिन कन्नौज की तरफ हुए हमलों ने पाल वंश को खत्म करने की कगार पे लाकर खड़ा कर दिया था देवपाल को प्राप्त राज्य धर्मपाल का राज्य था लेकिन मुंगेर पर राजधानी स्थानांतरित पाल वंश ने गलती करदी जिसका खामयाजा पाल वंश को चुकाना पड़ा और  देवपाल ने कन्नौज में हुए युद्ध मे मिहिर भोज के साथ हुए युद्ध मे भोजपुर पालवंश से छीन लिया हर पुनः युद्ध मे शामिल होने आए देवपाल को अपनी राजधानी तक गबानी पड़ी अंतिम। समय मे आये पाल वंशी    कमजोर शाशक नारायणपाल (लगभग 860-915 ई.) पाल वंश के विग्रहपाल का पुत्र और उत्तराधिकारी था। इसका शासन काल काफ़ी बड़ा था। राष्ट्रकूट राजा अमोघवर्ष ने पाल शासक नारायणपाल को पराजित किया था। प्रतिहारों ने इसका फायदा लेके पाल वंशी राजा से आमने सामने की लड़ाई मुंगेर में बुलाया जिसमे नारायण पाल को पराजय मिली और गुर्जर सम्राट ने  पूर्व की ओर अपनी शक्ति का विस्तार करना प्रारम्भ कर दिया था। ऐसे समय में नारायणपाल को न सिर्फ़ मगध से हाथ धोना पड़ा, अपितु पाल राज्य का मुख्य भाग उत्तरी बंगाल भी उसके हाथ से निकल गया यही बजह है कि बिहार का भोजपुर और भोजपुरी से जरूर  संबंध है ।।

अरबो के साथ संघर्ष-अरब के खलीफा मौतसिम वासिक, मुत्वक्कल, मुन्तशिर, मौतमिदादी थे। अरब के खलीफा ने इमरान बिन मूसा को सिन्ध के उस इलाके पर शासक नियुक्त किया था। जिस पर अरबों का अधिकार रह गया था।  सिन्ध के अरब शासक इमरान बिन मूसा को पूरी तरह पराजित करके समस्त सिन्ध गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य का अभिन्न अंग बना लिया था। केवल मंसूरा और मुलतान दो स्थान अरबों के पास सिन्ध में इसलिए रह गए थे कि अरबों ने गुर्जर प्रतिहार सम्राट के तूफानी भयंकर आक्रमणों से बचने के लिए अनमहफूज नामक गुफाए बनवाई हुई थी जिनमें छिप कर अरब अपनी जान बचाते थे। सम्राट मिहिर भोज नही चाहते थे कि अरब इन दो स्थानों पर भी सुरक्षित रहें और आगे संकट का कारण बने इसलिए उसने कई बड़े सैनिक अभियान भेज कर इमरान बिन मूसा के अनमहफूज नामक जगह को जीत कर गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य की पश्चिमी सीमाएं सिन्ध नदी से सैंकड़ों मील पश्चिम तक पंहुचा दी और इसी प्रकार भारत देश को अगली शताब्दियों तक अरबों के बर्बर, धर्मान्ध तथा अत्याचारी आक्रमणों से सुरक्षित कर दिया था। इस तरह सम्राट मिहिर भोज के राज्य की सीमाएं काबुल से रांची तक सिंध में मिल चुकी थी ।घस्सन द्वारा नियुक्त मूसा इब्न यज़ीद अल झलिद की 836AD में युद्ध में बार बार मिल रही बार बार की पराजय से मौत हो जाने पर उसका बेटा अरमान सिंध का सूबेदार बना इस से पहले अरब गुर्जरों के बारे में इतना जान चुके थे कि युद्ध मैदान में इनके पेर कांपते थे गुर्जरों के सामने आने से लेकिन नव नियुक्त ऊर्जावान सूबेदार अरमान को अभी गुर्जरों की भाले और तीरों का खट्टा स्वाद चखना बांकी था , अरमान के पूर्वजों ने गुज्जरों से हार खाने के  बाद अरबो के अधीन इलाके राजा विहीन हो चुके थे उन जगहों पर स्थानीय  निवासी  जाट ओर मेड फिर से दबंग हो गये थे ओर अरबों की कमज़ोरी का फ़ायदा उठा कर काबू से बाहर हो गये थे। अरमान ने किक्कन के इलाक़े के जाटों पर धावा बोलकर उनको फिर से काबू में किया ओर फिर मेड जाती के 3 हज़ार लोगों को क़त्ल करके उनको काबू में क़िया। कदबील का राजा मोहम्मद इब्न ख़लील जिस ने आज़ादी की घोषणा कर दी थी को भी पकड़ कर क़त्ल किया गया ओर कदबील की सारी की सारी आबादी खुसदर तब्दील कर दी गयी। जाटों ओर मेडों को काबू में रखने के लिए उसने किक्कन के पास अल बैजा नाम का क़िला बनाया जहाँ सेना की इक टुकड़ी हमेशा तैनात रहती थी। अरमान ने सकर अल मेड नाम की मेड जाती से इक सेना भी तैयार की जिसको जाटों के दमन के काम में लगाया गया। लेकिन सिंध दरिया के पूरव में गुज्जरों के इलाक़े के जाट दरिया पार करके अरबों को तंग कर रहे थे इस परेशानी से कराह उठे अरबों जाटों से ज़ाज़िया वसूला गया ओर वसूली के बाद ज़ाज़िया देने वाले जाटों क हाथ पर मोहर लगा दी गयी। अरमान ने अब जाटों की इक सेना तैयार की ओर उसकी सहयता से सिंध दरिया के पूरव में बसने वाले मेडों पर हमला किया। मेडों ने इक झील के बीचों बीच इक कल्लरी नाम के टापू से डट कर मुकाबला किया ओर गुज्जर सेना के आने का इंतज़ार करते रहे क्योंकि अब यह इलाक़ा गुज्जरों के अधीन था।  अरब सेना के नज़ारी ओर यमानी सैनिकों में आपस में झगड़ा हो गया। अरमान ने यमनीओ का साथ दिया। इक नज़ारी सैनिक ऑमर इब्न अल अज़ीज़ अल हब्बरी ने अरमान को क़त्ल कर दिया। इस वक़्त मिहिर भोज गुज्जरों का राजा था, गुज्जरों के इलाक़े में अरबों की दखल अंदाज़ी उस की बर्दाश्त की हद से बाहर थी। फ़ज़ल इब्न महान सिंध का सूबेदार बनकर आया ओर उसने कल्लरी पर आक्रमण के लिए  60 किश्तियों में सवार सैनिक भेजे जिनमेसे सभी मोत के घाट उतार दिए गए असल मे यह सैनिक टुकड़ी मेड समुदाय के लोगों की थी जिनको अरमान ने अपने अधीन कर लिया था यही लोग अरमान की तरफ से युद्ध मे शामिल थे । बहुत से मेड मार दिए गये। आख़िर 839 AD में गुज्जरों के महान राजा मिहिर भोज ने सैनिक कार्यवाही करके सिंध दरिया के पूर्वी इलाक़े में अरमान द्वारा बनाई अलोर के पास छावनी को तबाह कर दिया ओर अरब सैनिकों का क़त्ल ए आम कर दिया। बचे हुए अरब दरिया पार करके भाग गए।  उन छावनियों से कुछ बच कर अनमहफूज नामक गुफाए बनवाई हुई थी जिनमें छिप कर अरब अपनी जान बचाने में सफल रहे इनके विरुद्ध एक अंतिम युद्ध हुआ जिसमें अरबों  के युद्ध करने का मनोबल ही खत्म कर दिया और मिहिर भोज के साथ हुए इन 30 वर्ष के असंख्य युद्धों से होने बाली जन धन की अपार  हास्य को पूरा करने के लिए अरबों ने अपना ध्यान भारत से हटा लिया था ।  इसी दौरान पूर्वी भारत के पाल शासक धर्मपाल ने जो की पंजाब तक आगे बढ़ चुका था ने मोके का फ़ायदा उठाकर पश्चिमी पंजाब में अरबों के इक इलाक़े यवन पर धावा बोल कर उस पर क़ब्ज़ा कर लिया। यह बात मिहिर भोज को हजम नही हुई ओर गुज्जर सेना ने कन्नौज के पास धर्मपाल की पंजाब से लौट रही सेना पर जबरदस्त हमला करके पालों को धूल चटा दी। धर्मपाल मुश्किल से जान बचा कर बंगालभाग गया।अरबों ओर गुज्जरों क बीच संघर्ष के लंबे दौर में हम देखते हैं की यह कोई छोटी-मोटी जंग नहीं थी बल्कि कई साल चलने वाला इक युद्ध था जिसमें कई जंगे हुईं जो राजस्थान से अधिक मध्य प्रदेश (उज्जैन), गुजरात(वल्लभी, नान्दोल आदि),  यह युद्ध थे गुर्जर और अरब भेड़ियों के बीच जिसका सामना गुर्जर वंश के प्रत्येक महाराज ने अपनी प्रजा की सुरक्छा नारायण की तरह की थी इन युद्धों का  नतीजा गुज्जरों की जीत ओर अरबों की हार में निकला ओर गुज्जर सरदार  अरबों से भारत की हिफ़ाज़त करते रहे मूलतः भारत मे जो हमले हुए वो थल मार्ग से हुए थे और राष्ट्रकूट पूर्ण सुरक्छित थे उनपर उनकी प्रजा पर कोई बाहरी हमला संभव ही नही था क्यों कि उनसे पहले गुर्जर राजाओं के राज्य की सरहदें धरती से समुद्र तक सहेज कर चल रही थी गुर्जरों ने सिर्फ आने बाले दुश्मनों से अपने राज्य देश को प्रजा को बचाया था जिसके चलते गुर्जर सम्राट नारायण और प्रतिहार की उपाधि से जाने गए ।।

गुर्जर साम्राज्य की राजधानी-  गुर्जर साम्राज्य की राजधानी क्रमसः दो भागों में विभक्त थी प्रथम मुख्य राजधानी ,उप राजधानी ,सांस्कृतिक राजधानी ,  जिनमे मुख्य राजधानी के तौर पर कन्नौज उज्जैन थी उप राजधानी के बतौर ग्वालियर ,भोजपुर ,मिहिरोली, पेहोवा ,तथा गुजरात मे थी इसके अतिरिक्त सांस्कृतिक राजधानी उज्जैन जो कि छीप्र नदी के किनारे और  ओसिया थी तथा बटेस्वर थी  चम्बल नदी  के किनारे  थ।

गुर्जर कालीन कला -गुर्जर सम्राटों के हातो बनाये गए मंदिर
तेली का मंदिर ग्वालियर
राज्यस्थान गुजरात मध्यप्रदेश कन्नौज हिमाचल  तक प्राप्त हुए हैं ।गुर्जर प्रतिहार कालीन कुछ मुख्य मंदिरों का हम वर्णन करते हैं जो इतिहास प्रसिद्ध हैं मध्यप्रदेश मुरैना इस्थित











  बटेस्वरा के 300 कुल मंदिरों का समूह जो एक खुद विश्वकर्मा के बनाये प्रतीत होते हैं जिनका निर्माण गुर्जर सम्राट मिहिर भोज ने कराया था । चोंसठ योगनी मंदिर जिसकी
नकल करके संसद भवन का निर्माण कराया गया है "शनीचरा  के पहाड़ बानमोर के नजदीक गुर्जर प्रतिहार कालीन तालाब जो जर्जर अवस्था मे है तथा विष्णु की मूर्ति चोरी की जा चुकी है रथ पर विराजे विष्णु की थी प्रतिमा रिपोर्ट के अनुसार मंदिर के अधिष्ठान भाग(वेदीबंद) साबुत है। इसके तल वाले हिस्से पर मंदिर का गर्भगृह और मंडप भी मौजूद है। इस मंदिर का शिखर टूटा हुआ था। और मंदिर की मुख्य प्रतिमा रथ पर विराजे हुए विष्णु की थी। अधिष्ठान के नीचे देवी देवताओं की मूर्तियां बनी हुई थीं। जिनमें गणेश, विष्णु, ब्रह्मा, कार्तिकेय की प्रतिमाएं ललिताशन में थीं, जबकि मंदिर का दक्षिण की तरफ वाला हिस्सा पूरी तरह से ढह चुका था।
बनी हुई थीं। जिनमें गणेश, विष्णु, ब्रह्मा, कार्तिकेय की प्रतिमाएं ललिताशन में थीं, जबकि मंदिर का दक्षिण की तरफ वाला हिस्सा पूरी तरह से ढह चुका था ,मंदिर के पास ही पुरातत्वविदों को एक कुंड भी मिला था। जो प्रतिहार शैली में बना हुआ था। कच्छपघात और प्रतिहार वास्तु शैली के कुछ और मंदिर भी इस कुंड के आसपास होने पाए गए थे, लेकिन अब इनके निशान और भी मिट गए हैं। ऐसे में अगर मंदिर के संरक्षण का काम शुरू नहीं हुआ तो मंदिर का बचा खुचा हिस्सा भी नष्ट हो जाएगा। क्योंकि मंदिर के ज्यादातर भग्नावशेष लगातार यहां से गायब होते जा रहे हैं और स्थानीय लोगों को भी इनके महत्व का पता नहीं है।शनिश्चरा के जंगलों में मिला विष्णु मंदिर 10वीं सदी का है। इस मंदिर का अध्ययन कर 2012 में ही रिपोर्ट आर्कलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया को भेज दी थी। मंदिर के जीर्णोद्घार आदि का काम उन्हें ही करवाना होता है।(7)" इसके अतिरिक्त गोहद चोक ग्वालियर इटवाह हाईवे के पास खनन एरिया में गुर्जर कालीन शिव मंदिर जो पत्थर की खदानों में रोज होते बारूद के विस्फोट को सहता हुआ भी अटल खड़ा है लेकिन पुरातत्व विभाग के कान पर जूं तक नही रेंगती गुर्जर महाराजाओं के अवसेस संभालने के लिए  आगे चल कर फूप अटेर हाईवे मार्ग पर दुल्हागंन में इस्थित बौरेश्वर शिव मंदिर काफी अच्छी हालात में है इसके अतिरिक्त इस खबर का जिक्र वीरेन्द्र पाण्डेय, जिला पुरातत्व अधिकारी भिण्ड  जिन्होंने पत्रिका अखबार के माध्यम से जग जाहिर कराया था जिसका लेखन कार्य गौरव सेन ने किया था ।मडखेरा का गुर्जर प्रतिहार कालीन सूर्य मन्दिर जो बुंदेलखंड के टीकमगढ जिला मुख्यालय से 20km. दूर अपने आँचल मे गुर्जर प्रतिहार कला का मन्दिर आज भारत के गिने चुने सूर्य मन्दिरो मे अपनी स्थिती काफी मजबूती से कायम किये है !प्रतिहार कालीन ऊमरी का सूर्य मन्दिर मध्य प्रदेश के जिला टीकमगढ के ऊमरी मे  इस्थित है गुर्जर प्रतिहार कालीन विध्यमान प्राचीनकाल  का सूर्य मन्दिर  जिसका निर्माण सातवी  शताब्दी के अन्तिम दशक तथा आठवी शताब्दी  का निर्माण काल बताया जा रहा हो इस मन्दिर मे गुर्जर प्रतिहार राजाऔं का एक अभिलेख भी  मिला हे लेकिन पत्थर के छरण की बजह से ऊसका पढा जाना असम्भव हे इस मन्दिर के गर्भ ग्रह मे सप्त अश्व युक्त रथ पर आसीन  सूर्य नारायण भगवान की खडगासन मूर्ति बहुत ही सुन्दर तथा मनोहारी हैं  ।आपेश्वर महादेव मंदिर रामसीन गाँव का इस मंदिर का पुजारी कस्च्याप गोत्रीय रावल ब्राह्मण है , गुजरात मे गुर्जर कालीन साबरकांठा में मौजूद है इसके अतिरिक्त लाखेस्वर मंदिर  उत्तराखंड के अल्मोड़ा के 24 शिव मंदिर तथा कुल 240 मंदिर जिनमे 120 सबूत हैं आज भी हिमाचल के कुल्लू ,मध्य भारत के खुजराओ तेली का मंदिर चतुर्भुज मंदिर , देवगढ़ मंदिर,चंदेरी , दधिमाता मंदिर , समाधेस्वर मंदिर चित्तोड़ गढ़ ,आभानेरी की बाबड़ी , चंदेरी की बाबड़ी बड़ी छोटी बाबड़ी ,महरौली, ओसिया आदि काफी प्रसिद्ध ेेऐतिहआशिक स्थानों को गुर्जर प्रतिहारों ने खून पसीने से बनाया था ,

गुर्जर प्रतिहार वंश -
1-नागभट्ट (730-760 ईसवी)
2-ककुस्थ और देवशक्ति (760-778इस्वी)
3-वत्सराज (778-800इस्वी ) पत्नी सुंदरी देवी
4-नागभट्ट 2 (800-833इस्वी )
5-रामभद्र (833-835इस्वी ) पत्नी -महारानी अप्पा देवी
6- सम्राट मिहिर भोज(835-889 इस्वी),पत्नी -महारानी चंद्रभट्टारीक देवी
7-सम्राट महेन्द्रपाल प्रथम(885-910इस्वी)
8- सम्राट महिपाल (910-930इस्वी)
9-भोज द्वतीय (930-931)
10-विनायकपाल (931-944इस्वी)
11-महेन्द्रपाल द्वतीय (944-947इस्वी)
12-देवपाल (947-955इस्वी)
13-विजयपाल(955-985इस्वी)
14-राज्यपाल देव गुर्जर(985-1019)
15-त्रिलोचलपाल गुर्जर(1019-1030इस्वी)
16-यशपाल गुर्जर (1030-1040इस्वी ),  कुल 300 साल आर्यवृत पर गुर्जर वंश के इस परिवार ने राज किया था

गुर्जर राजवंश-
भड़ोच के (छाबड़ा/चाप/चपराना)
दद्दा1(580इस्वी),जयभट्ट1(605इस्वी),
दद्दा2 (प्रसंतराग-633 इस्वी),
दद्दा 3-(655इस्वी),जयभट्ट2-(680इस्वी),
दद्दा4-(706-734इस्वी), जयभट्ट3,दद्दा5-बाहुसहाय,
जयभट्ट4 -
भड़ोच के गुर्जरो ने हर्ष को कड़ी चुनोतियाँ देकर अकन राज्य स्थापित किया था इससे पहले दत्त गुर्जर नाम का गुर्जर वंशी हूण के तोरमाण का कर संग्रह कर्ता नियुक्त किया गया था जिसका नाम 499इस्वी की तारीख में आता है( 455-666इस्वी) तक हूण ने राज किया इनको अधिकतर इतिहासकार गुर्जर कहते हैं ,इनसे पहले मौखरी/मोरी वंश गुर्जरों का था आज भी मोरी गोत्र मालवा और चित्तौड़गढ़ के आसपास गुर्जरों में पाया जाता है , कुशाण वंश (65ईसा पूर्व-375ईस्वी)तक कुशाण गुर्जर वंशियों ने भारत के अखंड स्वरूप को विश्व पटल पर लेकर आये जिनसे कुसान ,कसाना,दोराता,अधाना, नेकाड़ी,चांदना, गोरसी,कपासिया आदि दर्जनों गोत्र निकले जिनका महान राजा कनिष्क जिन होने 78 इस्वी में शक संवत की स्थापना की थी , नर्सिंगढ के खींची गुर्जर ,बगड़ावत वंशी चौहान, चेंची वंशी चौहान अजमेर पुष्कर पर राज किया था ,1100इस्वी के बाद गुर्जरों के पास कम ही  राजवंश रह गए थे लेकिन फ़ीर भी गोविंदगढ़ ,
घुरैया बसई का घुरैया राजवंश-
महाराज श्री श्योपत सिंह घुरैया (1713-1750इस्वी)
महाराज राम पाल घुरैया (1750-1820इस्वी)
राजा राम घुरैया (1820इस्वी )
स्वर्गीय महाराज मुंशी सिंह घुरैया
वर्तमान इंजी रविन्द्र सिंह घुरैया तथा अन्य प्रसिद्ध घुरैया व्यक्तित्व एस पी यशवंत सिंह घुरैया , स्वामी हरिगिरि महाराज , श्री उत्तम सिंह घुरैया सरसपुरा , श्री नवल सिंह घुरैया ,सरनाम सिंह डीएसपी राजेन्द्र सिंह, डीएसपी भूपेंद्र सिंह आदि हैं ।राजोरगढ़ मंथन देव गुर्जर ,  फरीदाबाद अर्थात भड़ानक देश के  भड़ाना भड़ाना राज्य की ज्ञात वंशावली में,
कुमार पाल प्रथम (12वीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध), महाराजाधिराज अजयपाल (1150ई0)
 हरिपाल (1170 ई0),
सोहन पाल (1196 ई0),
कुमार पाल द्वितीय थे।
दिल्ली के तंवर गुर्जर महाराज अनंगपाल तंवर वंश ,जयपाल खटाना सिंध , सबलगढ़ के बैसला(1700इस्वी) , शिवपुरी गुना के बीहड़ों में डांडे की खिरक इस्थित गुर्जर शेरों की गड़ी आज भी मौजूद है (1700इस्वी) घुरैया गोत्र के वंश, लंधौरा रियासत, समथर रियासत और झबरेडा रियासत लंधौरा रियासत के वर्तमान महाराजा श्री कुँवर प्रणव सिंह जी परमार हैं  (पँवार वंश-"1700-1947इस्वी), समथर रियासत के वर्तमान महाराजा श्री रणजीत सिंह जी जूदेव (खटाणा) (1730-1947इस्वी)
1- श्री नौने शाह (1735-1740)
 2-श्री मदन सिंह जूदेव(1740-1745)
3-श्री राजधर विश्हना  सिंह(1745-1790)
4- श्री राजा देवी सिंह जूदेव (1791-1800)
5-श्री राजा रणजीत सिंह (प्रथम)(1800-1815)
6- श्री राजा रणजीत सिंह (द्वितीय) (1815-1827)
7- श्री महाराजा हिन्दू पति जूदेव (1827-1858)
8-श्री महाराजा चतुर सिंह जूदेव(1865-1896)
9-श्री महाराजा वीर सिंह जूदेव (1896-1935)
10-   श्री महाराजा राधाचरण सिंह जूदेव (1935-1947)
11-  श्री महाराजा रणजीत सिंह जूदेव (तृतीय )  (1947- अब तक,झबरेडा रियासत के यशवीर व कुलवीर सिंह इन तीनो गुर्जर प्रतिहार रियासतों के महल और किले बहुत ही खूबसूरत है

मिहिर भोज सम्राट का कुशल मंत्रिमंडल-
1-महामंत्री
2-महासंधिविग्रहक
3-महासेनापति
 4-महादण्डनायक
 5-महाप्रतिहार
 6-अमात्य
 7-महाप्रधर्माध्यक्च
8-महा लक्चपरलिक
9-महासामंत

इन सभी नवरत्न पदों से मिहिर भोज का दरबार सजता था ।

व्यावसायिक संघ -गुर्जर सम्राट मिहिर भोज के समय संघ का भी उल्लेख आता है पेहोवा अभिलेख के अनुसार घोड़ों के व्योपारियों का एक संघ भी बना था , सियादोनी अभिलेख के अनुसार तमोली, तेली, कलार, तथा ग्वालियर अभिलेख से मालकारों का जिक्र आता है  अन्य अभिलेख से कुंभकारों का भी जिक्र आता है ये सभी संघ अपनी कमाई का कुछ भाग राज्य के विकाश के लिए राजकोश में देते थे जो आपदा के समय आम जनता के ही काम आता था ।

भूमि नापने की इकाई -गुर्जर राजवंश में भूमि नापने की 7 इकाइयां थी कुलयवाप,द्रोणवाप, पाठक,हल, हस्त, पादावर्त, नल उपयोग में थी
संदर्व-
1- एपिग्राफिया इण्डिका भाग 1 पेज 175,
2-कल्हड़क्रत राजतरंगिणी 8/2518,
3-एपिग्राफिया इण्डिका भाग 1 पेज 159,
4-एपिग्राफिया इण्डिका भाग 1 पेज 184-190,
5-एपिग्राफिया इण्डिका भाग 1 पेज 162-179,
6-एपिग्राफिया इण्डिका भाग 5 पेज 211,
7- 1 सितम्बर 2015 दैनिक जागरण ,एसआर वर्मा, डिप्टी डायरेक्टर पुरातत्व संग्रहालय एवं अभिलेखागार ग्वालियर।।


Sunday, 18 November 2018

गूजरी भाषा

गुजरी भाषा व्याखया -
लेखक - इंजी. राम प्रताप सिंह 
कुषाणोँ ने बैक्ट्रीया पर अधिकार किया उसे समय ऊधर ग्रीक सभ्यता तथा लिपी ज्यादा मात्रा मे उपस्थित थी क्योंकि की ग्रीकों के अधीन यह जगह काफी समय सै थी जब कुषाणोँ ने अधिकार किया तो इनकी भाषा की जगह पर आर्य भाषा को लाये जबकी प्रारम्भिक समय मे ईधर खरोष्टी भाषा ही ग्रीक  लिपी मै चलती थी ज्यादा जिसके कुछ समय बाद यह बख्त्री भाषा का उपयोग होने लगा जंहा तक है रोबोटक अभिलेक के अनुसार इनके नामो के वर्णन मे "ओ" को ज्यादा महत्वदिया गया है जिसमे हम इस बात को देखते हैं की यह लोग बोलते कैसे थे उस समय Ozeno (Ujjain), Kozambo (Kausambi), Zagedo (Saketa), Palabotro (Pataliputra) and Ziri-Tambo (Janjgir(ship)-Champa). तथा कनिंघम के अनुसार जिस सिक्के पर कोर्स लिखा है अगर उसे गोर्स (गोर्सी) पढना चाहिये तो kus(a^-)na तो k=G, Gus(a^-)NA इसी क्रम मै आगे इनके सिक्कों पर तथा बी.ऐन.मुख़र्जी के अनुसारKomaro (Kumara) and called Maaseno (Mahasena) and called Bizago (Visakha), Narasao और Miro (Mihara). आदि शब्द इनके सिक्कों पर मिलते हैं जिनके अनुसार वासुदेव को वाजुदेव पढना चाहिये तथा स/श की जगह पर ये लोग "ज" का उपयोग करते थे अब हम कुसान/कुषान पर ध्यान देते हैं "क" को जब कनिंघम ने "ग" बताया है तब आगे "गुजान"(Gujan) जो की गूजर शब्द कि ही अप्रभंस है Komaro (Kumara) and called Maaseno (Mahasena) and called Bizago (Visakha), Narasao और Miro (Mihara). आदि शब्द इनके सिक्कों पर मिलते हैं जिनके अनुसार वासुदेव को वाजुदेव पढना चाहिये तथा स/श की जगह पर ये लोग "ज" का उपयोग करते थे अब हम कुसान/कुषान पर ध्यान देते हैं "क" को जब कनिंघम ने "ग" बताया है तब आगे "गुजान"(Gujan) जो की गूजर शब्द कि ही अप्रभंस है।जी. ए. ग्रीयरसन ने लिंगविस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया, खंड IX  भाग IV में गूजरी भाषा का का विस्तृत वर्णन किया हैं| गूजरों की भाषा गूजरी के बारे मे लिखने बाले सर डेन्जिल इबटसन ने कास्ट एन्ड ट्राइब्स आफ दी पिपुल (पंजाब कास्टस) 1883’’ इनकी भाषा पंजाबी तथा पश्तो सै बिल्कुल भिन्न हिन्दी है जो नरम जुबानी है "इसी भाषा को पूंछ ऐवटाबाद मे बोली जाती है जिसको नरम भाषा गूजरी कहते हैं यही भाषा अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान के सीमा प्रान्त इलाकों मे बहुतायात मे बोली जाती है यह क्षेत्र गुर्जरो के ही अधीन रहा है चाहे वो कसाणा /कुषाण हों या उनके वशंज खटाना या प्रतिहार हों लेकिन इतिहासकारों के अनुसार हूंणों के आगमन के समय इस भाषा का चलन कहा गया है जबकी इसका सम्बन्ध तो बख्त्री सै मिलते हैं | जाहीर  सी बात हे की कुसन वंश के बाद भारत में किसी भी  नयी जाती का आगमन नहीं हुआ हे जिस ने खुद की कोई संस्कृति का विकाश किया हो लेकिन वो सिरफ कुसन वंश ने किया था  जिस का जीता जगता सबूत उनकी भाषा तथा उनके अभिलेख मूर्तिकला आदि भारत में ज़िंदा हैं जिस से इस  का पता लगता हे की यह राजवंश  अपने समय में तररक्कि के किस पथ पे गमन कर रहा था लेकिन गुजरी भाषा के जो प्रमाड कुषाणों के समय में मिलते हैं वो किसी भी समय में नहीं मिलते हैं कुसनो के बाद सबसे बड़ा माइग्रेशन हूणों  का हुआ जिन की कोई भासा नहीं थी अगर हूडों की कोई भाषा होती तो माना जा सकता था की कुसन काल की भासा का इनके साथ कुछ मिलावट होसकती थी मगर ऐसा नहीं हुआ आज भी हम देखें तो कुसन और हूँड़ों के राज करने की जो रियासतें थीं उनमे मूलरूप से गुजरी भाषा का ही चलना हे उत्तरप्रदेश के गुर्जर बहुल एरिया में आज  भी राम राम को रोम रोम बोलै जाता हे,ओ को कॉमन कर के बोलै जाता हे जब आज कुषाण राजवंश को ख़त्म हुए    २००० वर्ष हो चुके हैं लेकिन हमारे लोगों की आज भी वोही भासा हे |  वैसे ही गूजरी बोली  में राम को रोम, पानी को पोनी, गाम को गोम, गया को गयो आदि बोला जाता हैं|इसी  भासा में कुसानो के सिक्कों   उन्हें बाख्त्री में कोशानो लिखा हैं और वर्तमान में गूजरी में  भी ओ को अतिरिक्त जोड़ के  कोसानो बोला जाता हौं| अतः कुषाणों द्वारा प्रयुक्त बाख्त्री भाषा और आधुनिक गूजरी भाषा की समानता भी कुषाणों और गूजरों की एकता को प्रमाणित करती हैं| ​
गुर्जरों की हमेशा ही अपनी विशिष्ट भाषा रही हैं| गूजरी भाषा के अस्तित्व के प्रमाण सातवी शताब्दी से प्राप्त होने लगते हैं| सातवी शताब्दी में राजस्थान को गुर्जर देश कहते थे, जहाँ गुर्जर अपनी राजधानी भीनमाल से यहाँ शासन करते थे| गुर्जर देश के लोगो की अपनी गुर्जरी भाषा और विशिष्ट संस्कृति थी| इस बात के पुख्ता प्रमाण हैं कि आधुनिक गुजराती और राजस्थानी का विकास इसी गुर्जरी अपभ्रंश से हुआ हैं| वर्तमान में जम्मू और काश्मीर के गुर्जरों में यह भाषा शुद्ध रूप में बोली जाती हैं|  जी. ए. ग्रीयरसन ने लिंगविस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया, खंड IX  भाग IV में गूजरी भाषा का का विस्तृत वर्णन किया हैं| इतिहासकारों के अनुसार कुषाण यू ची कबीलो में से एक थे, जिनकी भाषा तोखारी थी| तोखारी भारोपीय समूह की केंटूम वर्ग की भाषा थी| किन्तु बक्ट्रिया में बसने के बाद इन्होने मध्य इरानी समूह की एक भाषा को अपना लिया| इतिहासकारों ने इस भाषा को बाख्त्री भाषा कहा हैं| कुषाणों द्वारा बोले जाने वाली बाख्त्री भाषा और गुर्जरों की गूजरी बोली में खास समानता हैं| कुषाणों द्वारा बाख्त्री भाषा का प्रयोग कनिष्क के रबाटक और अन्य अभिलेखों में किया गया हैं| कुषाणों के सिक्को पर केवल बाख्त्री भाषा का यूनानी लिपि में प्रयोग किया गया हैं| कुषाणों द्वारा प्रयुक्त बाख्त्री भाषा में गूजरी बोली की तरह अधिकांश शब्दों में विशेषकर उनके अंत में ओ का उच्चारण होता हैं| जैसे बाख्त्री में उमा को ओमो, कुमार को कोमारो ओर मिहिर को मीरो लिखा गया हैं, वैसे ही गूजरी बोली  में राम को रोम, पानी को पोनी, गाम को गोम, गया को गयो आदि बोला जाता हैं| इसीलिए कुषाणों के सिक्को पर उन्हें बाख्त्री में कोशानो लिखा हैं और वर्तमान में गूजरी में कोसानो बोला जाता हौं| अतः कुषाणों द्वारा प्रयुक्त बाख्त्री भाषा और आधुनिक गूजरी भाषा की समानता भी कुषाणों और गूजरों की एकता को प्रमाणित करती हैं| हालाकि बाख्त्री और गूजरी की समानता पर और अधिक शोध कार्य किये जाने की आवशकता हैं, जो कुषाण-गूजर संबंधो पर और अधिक प्रकाश डाल सकता हैं|
Organizations working for Gojri:
Tribal Research and Cultural Foundation PoonchGurjar Desh Charitable Trust JammuAnjmun Gujjran SrinagarJammu and Kashmir Anjuman Taraqi Gojri Adab RajouriBhartya Gurjar Pareshad Uatter Pradesh.Anjuman Gojri Zuban-o-Adab Tral KashmirOrganisation of Himalyan Gujjars PoonchAdbi Sangat Wangat KashmirAdbi Majlis Gojri JammuSarwari Memorial Gojri Society JammuGojri Dramatic Club JammuGujjar Writers Association Uri Baramulla.Gojri Anjumun BadgamGujjar Manch KathuaBazm-i-Adab Kalakote RajouriGojri Development Center Karnah KupwaraHalqa.e.Gojari Adab GilgitBazm-e-Gojri, Pakistan (Rawalpindi/islamabad)

कुषाणों की मिश्रित साखा

कंम्बोज रक्त कुल संबंध।
लेखक-इंजी राम प्रताप सिंह
कंबोज उत्तरापथ के गांधार के निकट स्थित प्राचीन भारतीय जनपद था जिसकी ठीक-ठाक स्थिति दक्षिण पश्चिम के पुँछ के इलाके के अंतर्गत मानी जा सकती है। प्राचीन संस्कृत एवं पाली साहित्य में कंबोज और गांधार का नाम प्राय: साथ-साथ आता है। जिस प्रकार गांधार के उत्कृष्ट ऊन का वर्णन ऋग्वेद में मिलता है (१,१२६) उसी प्रकार कंबोज के कंबलों का उल्लेख यास्क के निरुक्त में हुआ है (२, २)। वास्तव में यास्क ने 'कंबोज' शब्द की व्युत्पत्ति ही 'सुंदर कंबलों का उपभोग करनेवाले' या विकल्प में सुंदर भोजन करनेवाले लोग-इस प्रकार की है। गांधार और कंबोज इन दोनों जनपदों के अभिन्न संबंध की परंपरा से ही इनका सान्निध्य सिद्ध हुआ है। गांधार अफगानिस्तान (कंदहार) का संवर्ती प्रदेश था और इसी के पड़ोस में पूर्व की ओर कंबोज की स्थिति थी। कंबोज प्राचीन भारत के १६ महाजनपदों में से एक था। इसका उल्लेख पाणिनी के अष्टाध्यायी में १५ शक्तिशाली जनपदों में से एक के रूप में भी मिलता है। बौद्ध ग्रन्थ अंगुत्तर निकाय , महावस्तु मे १६ महाजनपदों में भी कम्बोज का कई बार उल्लेख हुआ है - ये गांधारों के समीपवर्ती थे। इनमें कभी निकट संबंध भी रहा होगा, क्योंकि अनेक स्थानों पर गांधार और कांबोज का नाम साथ साथ आता है। इसका क्षेत्र आधुनुक उत्तर पश्चिमी पाकिस्तान और अफगानिस्तान में मिलता है। राजपुर, द्वारका तथा Kapishi[1] इनके प्रमुख नगर थे। इसका उल्लेख इरानी प्राचीन लेखों में भी मिलता है जिसमें इसे राजा कम्बीजेस के प्रदेश से जोड़ा जाता है।
प्राचीन वैदिक साहित्य में कंबोज देश या यहाँ के निवासी कांबोजों के विषय में कई उल्लेख हैं जिनसे ज्ञात होता है कि कंबोज देश का विस्तार उत्तर में
कश्मीर से हिंदूकुश तक था। वंश ब्राह्मण में कंबोज के औपमन्यव नामक आचार्य का उल्लेख है।
शतपथ ब्राह्मण के एक स्थल से ऐसा प्रतीत होता है कि उत्तरी लोगों अर्थात उत्तरी कुरुओं की तथा कुरु-पांचालों की बोली समान और शुद्ध मानी जाती थी।
वाल्मीकि- रामायण में कंबोज, वाल्हीक और वनायु देशों को श्रेष्ठ घोड़ों के लिये उत्तम देश बताया है, जो इस प्रकार है:
“ ' कांबोज विषये जातैर्बाल्हीकैश्च हयोत्तमै: वनायुजैर्नदीजैश्च पूर्णाहरिहयोत्तमै: [3] „
महाभारत के अनुसार अर्जुन ने अपनी उत्तर दिशा की दिग्विजय-यात्रा के प्रसंग में दर्दरों या दर्दिस्तान के निवासियों के साथ ही कांबोजों को भी परास्त किया था-
'गृहीत्वा तु बलं सारं फाल्गुन: पांडुनन्दन: दरदान् सह काम्बोजैरजयत् पाकशासनि:'
महाभारत और राजतरंगिणी में कंबोज की स्थिति उत्तरापथ में बताई गई है।महाभारत में कहा गया है कि कर्ण ने राजपुर पहुंचकर कांबोजों को जीता, जिससे राजपुर कंबोज का एक नगर सिद्ध होता है- 'कर्ण राजपुरं गत्वा काम्बोजानिर्जितास्त्वया'। कालिदास ने रघुवंश में रघु के द्वारा कांबोजों की पराजय का उल्लेख किया है, जो इस प्रकार है कि :“ काम्बोजा: समरे सोढुं तस्य वीर्यमनीश्वरा:, गजालान् परिक्लिष्टैरक्षोटै: सार्धमानता: „इस उद्धरण में कालिदास ने कंबोज देश में अखरोट वृक्षों का जो वर्णन किया है वह बहुत समीचीन है। इससे भी इस देश की स्थिति कश्मीर के आस पास प्रतीत होती हैं।महाभारत में कहा गया है कि कर्ण ने राजपुर पहुंचकर कांबोजों को जीता, जिससे राजपुर कंबोज का एक नगर सिद्ध होता है- 'कर्ण राजपुरं गत्वा काम्बोजानिर्जितास्त्वया'। चीनी यात्री हुएन-सांग ने भी अपनी भारत यात्रा के दोरान कंबोज में किसी राजपुर नगर का उल्लेख किया था। [8] महाभारत में हिमालय के उत्तर पश्चमी भाग में बाह्वीक के निकटवर्ती क्षेत्र को दरद देश माना गया है (आदि पर्व ६७/५८ )।. पुराणो में दरद जाति को काम्बोज व बर्बर जातियों के मध्य रखा गया है। कश्मीर के उत्तर भाग में आज भी दरद पुरी  है।  शायद इस जाति का प्रसार अवश्य हुआ है  किन्तु शक /कुषाण /यूची जाति के साथ मिश्रण से इस जाति की अपनी विशिष्टता समाप्त हो गयी होगी।महाभारत में कंबोज के कई राजाओं का वर्णन है जिनमें सुदर्शन और चंद्रवर्मन मुख्य हैं। कौटिल्य अर्थशास्त्र में कंबोज के 'वार्ताशस्त्रोपजीवी' (खेती और शस्त्रों से जीविका चलाने वाले) संघ का उल्लेख है जिससे ज्ञात होता है कि मौर्यकाल से पूर्व यहां गणराज्य स्थापित था। मौर्यकाल में चंद्रगुप्त के साम्राज्य में यह  गणराज्य विलीन हो गया होगा।कुसान /शक/हूण की अधिकतर मिश्रित है जिसके चलते ये समझ ना मुश्किल है कि ये जात किस से उत्पन्न हुई इतिहासकारो ने अधिकतर इतिहासकारों का विचार है कि ये कंबोडिया से आये हैं लेकिन जो किसी भी तर्क से संभव नही है क्यों कि सिर्फ विचार कर के मत देना पूर्ण गलत है जिस कंम्बोज की नश्ल शक,कुषाण, हूण की नश्ल के दिखते हैं A branch of Central Asian Kambojas seems also to have migrated eastwards towards Tibet in the wake of Kushana (1st century) or else Huna (5th century) pressure and hence their notice in the chronicles of Tibet (Kam-po-tsa, Kam-po-ce, Kam-po-ji) and Nepal (Kambojadesa). [ "The view that Nepali Traditions apply name Kamboja Desha to Tibet is based on the statement made by Foucher, [Iconographie bouddhique pp 134-135] on the authority of Nepali Pandit of B.H Hdgson. But it is supported by two manuscripts [No 7768 & 7777] कम्बोज  मूल रूप से आर्यन्स नश्ल के थे जिनको अधिकतर इतिहासकारों ने आर्यन्स नश्ल का ही बताया है Kshatriya clans of north-west must have descended from the Ancient Kambojas. [ For reference to overlap of the Kamboj  clan names, see Glossary of Tribes, II, p 444, fn. iii.कंम्बोज सूर्य पूजा करने के कारण इनको सूर्यवंशी होने का भी मत है The Kamboj in Phillaur, District Jullundur, too claimed to be "Suryavanshi" [Glossary of Tribes, Vol II, p 443 fn, H. A. Rose.].जातियों की पहचान के लिये अंग्रेज-अन्वेषकों ने कई साधन निकाले हैं जिनमें से दो मुख्य है -
1. शारीरिक बनावट।
2. भाषा-विज्ञान।
शरीर-शास्त्र के साधन से अन्वेषकों ने मनुष्य जाति को पांच भागों में विभक्त कर दिया है -
 1. आर्य,
2. मंगोलियन,
3. मलय,
4. हबशी
5. अमेरिकन
रंग के हिसाब से ये ही जातियां गौरी, पीली, बादामी, काली और लाल कहलाती है। आर्य लोग रंग के गोरे या उजले उंचे ललाट वाले, सुआसारी नाक, चौड़ी छाती और काली आंखें तथा लम्बी बाहें और टांगें रखने वाले होते हैं। मंगोलियन अथवा तातारियों की चिपटी नाक, पीला रंग, चपटा माथा होता है। यही बजह होती है किसी जाति की पूर्वज और वंसजों की पहचान के जिसके तर्क मौजूद हैं  मि. ई. बी. हेवल लिखते हैं "Ethnographic investigations show that the Indo-Aryan type described in the the Hindu epic - a tall, fair complexioned, long headed race, with narrow prominent noses, broad shoulders, long arms, thin-waists like a lion and thin legs like a deer"कंम्बोज जाती का कंम्बोज महाजनपद से समस्त भारत के उत्तर मध्य भू भाग में प्रवेश हुआ जिसके चलते आज ये अपने मूल को भूल चुके हैं और ये आज जाट ,राजपूत,खत्री जैसी समस्त जातियों में मौजूद हैं साथ ही हिन्दू मुसलिम सिक्ख धर्म मे भी मौजूद हैं तथा साथ कुछ हिस्सों में स्वतंत्र कंम्बोज जाती के रूप में भी हैं कंम्बोज जाती आज गुजरात During Indo-Scythian invasion of India in the pre-Kushana period, Kambojas appear to have migrated to Gujrat, Southern India, कन्नौज ,दिल्ली ,हरयाणा ,पंजाब में मिल सकती है  Pehova Prasati Evidence

Even after settling in India, the Kambojas had continued to maintain their position in science and arts. The Pehova Prasati (panegyric) of the reign of king Mahendrapala of Kanauj (10th century AD) refers to one "Acyuta Kamboja", son of "Vishnu Kamboja" who has been described as a great Sanskrit scholar. Acyuta Kamboja is also styled as the personification of "Vaidya Dhanavantri", the fatherof Ayurvedic systmof medicine [Epigraphiia Indica Vol I, 1892, p 247.] लेकिन इनका मूल वंश गुर्जर कहना कोई अतिशयोक्ति नही होगी जिनके गोत्र नश्ल शारीरिक बनाबट गुर्जरों जैसी है The Kamboj undoubtedly are, and therefore, the Arains, in all probability, are a mixture of numerous diverse ethnic elements from the ancient Sakas,Kambojas, Yavanas, Pahlavas, Hunas, Gurjaras etc. It is notable that the title of "Mahar(mihir)" is prevalent both among the Arains as well as the Gujjars [The Tribes and Castes of the North-western Provinces and Oudh, 1896, p 206, William Crooke - Ethnology.] तो उनको क्या कहा जा सकता है कंम्बोज जाती को कन्नौज में रहने की जगह गुर्जर सम्राट महिपाल देव के समय मे मिली थी सम्भवतः सम्भव है कि इनको पहोवा से कन्नौज तक लाने का श्रेय भी महिपाल देव का ही था

गुर्जर घार के तांत्रिक विश्व विद्यालय

गुर्जर घार भाग 2-
लेखक- इंजी राम प्रताप सिंह     
चौंसठ योगिनी मंदिर को अपने जमाने का तांत्रिक यूनिवर्सटी के लिए परिधत्ता प्राप्त हुई थी विदेसी यात्रियों ने इस यूनिवर्सटी में अपने अध्ययन को पूरा किया था-
निर्माण काल : आठवी सदी से नो वी सदी,
स्थान : मितावली, मुरैना ,गुर्जर घार (मध्य प्रदेश)
निर्माता :  गुर्जर सम्राट मिहिर भोज और महिपाल
ख़ासियत : प्राचीन समय में यहां तांत्रिक अनुष्ठान होते थे दुनिया मे 4 ही यूनिवर्सटी थी तांत्रिक साधना के लिए ,भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इस मंदिर को प्राचीन ऐतिहसिक स्मारक घोषित किया है।इकंतेश्वर महादेव मंदिर' के नाम से भी जाना जाता है।
आकार : गोलाकार, 101 खंभे कतारबद्ध हैं। यहां 64 कमरे हैं, जहां शिवलिंग स्थापित है। आज इसकी कला का अद्भुत नमूना भारतीय संसद भवन है ।
ऊंचाई : भूमि तल से 300 फीट             भारत में चार प्रमुख चौसठ-योगिनी मंदिर हैं। दो ओडिशा में तथा दो मध्य प्रदेश में। लेकिन इन सब में मध्य प्रदेश के मुरैना स्तिथ चौसठ योगिनी मंदिर का विशेष महत्तव है। इस मंदिर को गुजरे ज़माने में तांत्रिक विश्वविद्यालय कहा जाता था। उस दौर में इस मंदिर में तांत्रिक अनुष्ठान करके तांत्रिक सिद्धियाँ हासिल करने के लिए तांत्रिकों का जमवाड़ लगा रहता था। मौजूदा समय में भी यहां कुछ लोग तांत्रिक सिद्धियां हासिल करने के लिए यज्ञ करते हैं।ग्राम पंचायत मितावली, थाना रिठौराकलां, ज़िला मुरैना (मध्य प्रदेश) में यह प्राचीन चौंसठ योगिनी शिव मंदिर है। इसे ‘इकंतेश्वर महादेव मंदिर’ के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर की ऊंचाई भूमि तल से 300 फीट है। इसका निर्माण तत्कालीन प्रतिहार क्षत्रिय राजाओं ने किया था। यह मंदिर गोलाकार है। इसी गोलाई में बने चौंसठ कमरों में हर एक में एक शिवलिंग स्थापित है। इसके मुख्य परिसर में एक विशाल शिव मंदिर है।भारतीय पुरातत्व विभाग के मुताबिक़, इस मंदिर को नवीं सदी में बनवाया गया था। कभी हर कमरे में भगवान शिव के साथ देवी योगिनी की मूर्तियां भी थीं, इसलिए इसे चौंसठ योगिनी शिवमंदिर भी कहा जाता है। देवी की कुछ मूर्तियां चोरी हो चुकी हैं। कुछ मूर्तियां देश के विभिन्न संग्रहालयों में भेजी गई हैं। तक़रीबन 200 सीढ़ियां चढ़ने के बाद यहां पहुंचा जा सकता है। यह सौ से ज़्यादा पत्थर के खंभों पर टिका है। किसी ज़माने में इस मंदिर में तांत्रिक अनुष्ठान किया जाता था।यह स्थान ग्वालियर से करीब 40 कि.मी. दूर है। इस स्थान पर पहुंचने के लिए ग्वालियर से मुरैना रोड पर जाना पड़ेगा। मुरैना से पहले करह बाबा से या फिर मालनपुर रोड से पढ़ावली पहुंचा जा सकता है। पढ़ावली ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। यही वह शिवमंदिर है, जिसको आधार मानकर ब्रिटिश वास्तुविद् सर एडविन लुटियंस ने संसद भवन बनाया।                 आघव गुर्जर                      शेष अगले भाग में जारी...........

गुर्जर घार के प्राचीन जनपद

गुर्जर घार भाग 3 -
लेखक -इंजी. राम प्रताप सिंह
कुतवार जनपद परिचय एतिहासिक और कथात्मक तथा साहित्यात्मक कुतवार का महत्व काफी महान है विगत ज्ञात तथा लिखित इतिहास के तर्क वितर्क में ना फस के  हम सिर्फ कुतवार के सभी विवरणों को इसमे लेंगे कुतवार, कोटवार ,कुन्तलपुर, कोटबार, कुन्तिभोज  के नामो से इतिहास में प्रसिद्ध प्राचिन जनपद का इतिहास गौरव का रहा है जिसमे कुतवार की वर्तमान स्थति यह आसन नदी के तट पर स्थित है और ग्वालियर से 20 मील है और बानमोर मुरैना से 16किलोमीटर दूर है । कांतिपुरी जो प्राचीन पद्मावती के निकट ही स्थित थी गुप्तकाल में  नागराजाओं के अधिकार में थी।  विष्णुपुराण 4,24,64 में पद्मावती में नागराजाओं का उल्लेख है। कांतिपुरी के कुंतीपुरी , कुंतीपद, और कुंतलपुरी नाम भी मिलते हैं। पांडवों की माता कुंती संभवत: इसी नगरी के राजा कुंतिभोज की पुत्री थी इसके अतिरिक्त कुंती भोज का विवरण महाभारत "शिरॊ ऽभूथ थरुपथॊ राजा महत्या सेनया वृतः, कुन्तिभॊजश च चैथ्यश च चक्षुष्य आस्तां जनेश्वर "Mahabharata (VI.46.45) लेकिन हमको कुंती भोज ही मिलता है इसकी प्राचीनता हम उस जगह पे जाकर देख सकते हैं "द्रविडाः सिंहलाश चैव राजा काश्मीरकस तदा, कुन्तिभॊजॊ महातेजाः सुह्मश च सुमहाबलः Mahabharata (II.31.12)" हमे कुंतीभोज के कुशल राज्य का पता लगता है "नवराष्ट्रं विनिर्जित्य कुन्तिभॊजम उपाथ्रवत, परीतिपूर्वं च तस्यासौ परतिजग्राह शासनम Mahabharata (II.28.6)"कुंती के पिता कुंति भोज ने राजधानी कुंतलपुर में आसन नदी के किनारे अपनी पुत्री के लिए बनवाया था,इसी मंदिर के किनारे कुंती ने सूर्य देव की कृपा से महाभारत युद्ध के महारथी कर्ण को जन्म दिया लोकलाज से बचने के लिए  इसी मंदिर के किनारे बने घाट से सोने की पेटी में कवच-कुंडलों के साथ कर्ण को सुरक्षित रख कर नदी में बहा दिया था। आसन नदी के के किनारे आज भी पत्थरों पे रथ तथा घोड़ों के निसान मौजूद हैं ।कुंती भोज की महाभरत के युद्ध मव हत्या के बाद कुतवार का साहित्यक अता पता नही लगता है । अपितु ऐतिहासिक काल का उद्गम नाग वंश और वंसफ़र गुर्जर और कुषाण गुर्जर काल मे निकलता है ,कनिघम के अनुसार कुतवार पे प्रारमब्भिक समय मे  नाग वंश ने वंसफ़र के अधीन सत्ता संभाली और उसके बाद ये कुसानो के अधीन आ गये जिस के चलते नागों ने अपने दूर गामी राज्य पवाया ,विदिशा, और मथुरा से संपर्क बना लिए जिसके चलते इनके कुतवार पे भारशिव का उदय होता है  140ईसा में जिसके बाद

नवा नाग जिसकी उम्र के 27 वर्ष में उसने नवा नाग वंश की स्थापना की थी, भारशिव (140-170 इस्वी ),वीरसेन 170-210 अपनी उम्र के 34 साल में  ये मथुरा और कुतवार की साझी सत्ता के संपर्क स्थापित किये इसने ,हया नाग(210-245) ,ट्राय नाग(245-250 )बरहिना नाग (250-260),चराज नाग ( 30 साल) (260-290)भाव नाग (290-315 इस्वी ),रुद्रसेन नाग (315-344 इस्वी )          शेष अगली भाग में जारी..............

ग्वालियर एक परिचय

गुर्जर घार भाग 4-
लेखक- इंजी.राम प्रताप सिंह 

ग्वालियर को गुर्जर सम्राज्य के बाद गुर्जर घार के नाम से जाना जाने लगा था , ग्वालियर नगर और क्षेत्र का प्राचीनतम नाम गोपराष्ट्र मिलता है। पहले यह गोपराष्ट्र चेदि जनपद के अंतर्गत था। कालांतर में यह स्वतंत्र जनपद हो गया है। उस समय जनपद का अर्थ राष्ट्र के रूप में प्रयोग होने लगा।
इसके चारों ओर जनपद थे जिसमे, सूरसेन चेदि, निषध, आदि राष्ट्र थे। ग्वालियर का सर्वाधिक प्राचीन उल्लेख मार्कण्डेय पुराण में गोवर्धनपुरम्‌, मानसिंह तोमर (1489-1510 ई.) के शिलालेख में"गोवर्धनगिरि"  सन्‌ 525 ई. के "मातृचेट" शिलालेख में "गोपाह्य" के नाम से मिलता है। मिहिरकुल के राज्य के पंद्रहवें वर्ष (सन्‌ 527 ई.) में यहाँ के गढ़ को गोपमूधर, दसवीं शताब्दी में गुर्जर प्रतिहारों के शिलालेख में गोपाद्रि तथा गोपागिरि, रत्पनाल कच्छपघात के लगभग 1115 ई. के शिलालेख में गोपाद्रि तथा गोपागिरि, रत्नपाल कच्छपघात के लगभग 1115 ई. के शिलालेख में "गोपक्षेत्र" विक्रम संवत्‌ 1150 ई. के शिलालेख में गोपाद्रि तथा अनेक शिलालेखों में "गोपाचल" "गोपशैल" तथा "गोपपर्वत" वि.सं. 1161 के शिलालेख में गोपलकेरि, ग्वालियर खेड़ा कहा गया है।अपभ्रंश भाषा में कवियों ने इस दुर्ग को "गोपालगिरि, गोपगिरि, गोव्वागिरि"कहा है। हिंदी में सबसे पहले सन्‌ 1489 में कवि मानिक ने "ग्वालियर" संज्ञा का प्रयोग किया है। तुर्क इतिहासकारों ने गालेवार या गलियूर लिखा है।मराठी में "ग्वाल्हेर" कहते हैं। कश्मीर के सुल्तान नेतुल आवेदीन के  राजकवि जीवराज ने "गोपालपुर"के नाम से संबोधित किया है।भट्टारक सुरेंद्र कीर्ति ने सं. 1740 में रचि रविव्रत कथा में ग्वालियर को गढ़ गोपाचल लिखा है- "गढ़गोपाचल नगर भलो शुभ शानो" साथ ही अनेक जैन ग्रंथ प्रशस्तियों में एवं जैन प्रतिमा प्रशस्तियों में गोपाचल दुर्ग, गोपाद्रौ, गोयलगढ़, गोपाचल आदि नामों का अधिकतम उल्लेख मिलता है। ग्वालियर में मौजूद ग्वालियर किले का निर्माण 8वीं शताब्दी में किया गया था. तीन वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैले इस किले की ऊंचाई 35 फीट है. यह किला मध्यकालीन स्थापत्य के अद्भुत नमूनों में से एक है. यह ग्वालियर शहर का प्रमुख स्मारक है जो गोपांचल नामक छोटी पहाड़ी पर स्थित है. लाल बलुए पत्थर से निर्मित यह किला देश के सबसे बड़े किले में से एक है और इसका भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान है.बहुत समृद्ध है ग्वालियर के किले का इतिहास इतिहासकारों के दर्ज आंकड़े में इस किले का निर्माण सन 727 ईस्वी में सूर्यसेन नामक एक स्थानीय सरदार ने किया जो इस किले से 12 किलोमीटर दूर सिंहोनिया गांव का रहने वाला था. इस किले पर कई  राजाओं ने राज किया है. किले की स्थापना के बाद करीब 989 सालों तक इस पर गुर्जर वंश ने राज किया जिसके गुर्जर साम्राट देवराज, वत्सराज, ककुस्थ, रामभद्र, मिहिरभोज महान गुर्जर सम्राट, महिपाल गुर्जरेंद्र, महेन्द्रपाल आदि गुर्जर वंश के राजाओं ने ग्वालियर पर 250 साल राज किया जिसकी जानकारी हमे ग्वालियर प्रस्सति और ,सागर ताल अभिलख से मिलती है ,गुर्जर सम्राट मिहिर भोज महान की बनाई गयी तेली का मंदिर , सास बहु का मंदिर ,चतुर्भुज मंदिर बनबाई गए थे आदि का निर्माण बन बाये थे । इसके बाद इस पर प्रतिहार वंश ने राज किया. 1023 ईस्वी में मोहम्मद गजनी ने इस किले पर आक्रमण किया लेकिन उसे हार का सामना करना पड़ा. 1196 ईस्वी में लंबे घेराबंदी के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक ने इस किले को अपनी अधीन किया लेकिन 1211 ईस्वी में उसे हार का सामना करना पड़ा. फिर 1231 ईस्वी में गुलाम वंश के संस्थापक इल्तुतमिश ने इसे अपने अधीन किया इसके बाद मानसिंह तोमर ने अपने कब्जे में कर लिया था  (1486-1516) जिन्होंने अपनी पत्नी मृगनयनी के लिए गूजरी महल बनवाया. 1398 से 1505 ईस्वी तक इस किले पर तोमर वंश का राज रहा.मानसिंह ने इस दौरान इब्राहिम लोदी कीअधीनता  स्वीकार ली थी. लोदी की मौत के बाद जब मानसिंह के बेटे विक्रमादित्य को हुमायूं ने दिल्ली दरबार में बुलाया तो उन्होंने आने से इंकार कर दिया. इसके बाद बाबर ने ग्वालियर पर हमला कर इसे अपने कब्जे में लिया और इसपर राज किया. लेकिन शेरशाह सूरी ने बाबर के बेटे हुमायूं को हराकर इस किले को सूरी वंश के अधीन किया. शेरशाह की मौत के बाद 1540 में उनके बेटे इस्लाम शाह ने कुछ समय के लिए अपनी राजधानी दिल्ली से बदलकर ग्वालियर कर दिया. इस्लाम शाह की मौत के बाद उनके उत्तराधिकारी आदिल शाह सूरी ने ग्वालियर की रक्षा का जिम्मा हेम चंद्र विक्रमादित्य (हेमू) को सौंप खुद चुनार चले गए. हेमू ने इसके बाद कई विद्रोहों का दमन करते हुए कुल 1553-56 के बीच 22 लड़ाईयां जीतीं. 1556 में हेमू ने ही पानीपत की दूसरी लड़ाई में आगरा और दिल्ली में अकबर को हराकर हिंदू राज की स्थापना की. इसके बाद हेमू ने अपनी राजधानी बदलकर वापस दिल्ली कर दी और पुराना किला से राज करने लगा.इसके बाद अकबर ने ग्वालियर के किले पर आक्रमण कर इसे अपने कब्जे में लिया और इसे कारागर में तब्दील कर दिया गया. मुगल वंश के बाद इसपर राणा और जाटों का राज रहा फिर इस पर मराठों ने अपनी पताका फहराई.1736 में जाट राजा महाराजा भीम सिंह राणा ने इस पर अपना आधिपत्य जमाया और 1756 तक इसे अपने अधीन रखा. 1779 में सिंधिया कुल के मराठा छत्रप ने इसे जीता और किले में सेना तैनात कर दी. लेकिन इसे ईस्ट इंडिया कंपनी ने छीन लिया. फिर 1780 में इसका नियंत्रण गौंड राणा छत्तर सिंह के पास गया जिन्होंने मराठों से इसे छीना. इसके बाद 1784 में महादजी सिंधिया ने इसे वापस हासिल किया. 1804 और 1844 के बीच इस किले पर अंग्रेजों और सिंधिया के बीच नियंत्रण बदलता रहा. हालांकि जनवरी 1844 में महाराजपुर की लड़ाई के बाद यह किला अंततः सिंधिया के कब्जे में आ गया.
शेष अगले भाग में