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Sunday, 18 November 2018

गुर्जर घार की सीमा

गुर्जर घार भाग 5-
लेखक- इंजी. राम प्रताप सिंह
गुर्जर घार की भौगोलिक स्थिति वर्तमान का आगरा , मुरैना ,गोहद, ग्वालियर, श्योपुर, सबलगढ़ ,धौलपुर, प्राचीन पवाया, प्राचीन कुन्तलपुर, प्राचीन सिहोनिया,पूर्व  भड़ानक राज्य की सरहद,  फतेहाबाद ,करकोली आदि ये गुर्जर घार के हिस्से थे जिसमें  बारे में ये कहना है कि चम्बल नदी गुर्जर घार को बांटती थी जिसमे विभिन्न नदियां हैं वर्तमान फतेहाबाद तथा फिरोजाबाद तहसील में यमुना के दोनों तरफ लगभग गुर्जरों के 60 गाँव हैं, तथा स्थानीय बोलचाल में इस 60 गाँव के क्षेत्र को गूजरघार कहा जाता हैं, जिसका अर्थ हैं - गूजरों का घर|फतेहाबाद कस्बे के पश्चिम में भरापुर गूजराघार का पहला गाँव हैं, इसके पूर्व में यमुना किनारे तक करीब 21 गाँव हैं तथा यमुना पार फिरोजाबाद तहसील में  करीब 38 गाँव गुर्जरों के हैं|
 फतेहबाद तथा फिरोजाबाद की ताल्लुकेदार होने के नाते ये सभी गाँव चौधरी लक्ष्मण सिंह की ताल्लुकेदारी में आते थे जिनकी रियासत का प्रारम्भ गुर्जर घार से होता था तथा करकोली के जमींदार चौधरी फतेह सिंह की जमींदारी आती थी।

गुर्जर घार हुण गुर्जर

गुर्जर_घार भाग 6-. गुर्जर घार हुण गुर्जरों की सत्ता
लेखक -इंजी. राम प्रताप सिंह
गुर्जर , हूण राजवंश को गुर्जर राजवंश की ही सत्ता के रूप में जाना जाता है इस मत के अनुसार विदित सभी इतिहासकारों ने एक मत जबाब दिए जिसके अनुसार हुण गुर्जर थे , बुहलर, होर्नले, वी. ए. स्मिथ, विलियम क्रुक आदि इतिहासकारो ने गुर्जरों को श्वेत हूणों से सम्बंधित माना हैं|  कैम्पबेल और डी. आर. भंडारकर गुर्जरों की उत्पत्ति श्वेत हूणों की खज़र शाखा से बताते हैं| भारत में आज भी ‘हूण’ गुर्जरों का एक प्रमुख गोत्र हैं जिसकी आबादी अनेक प्रदेशो में हैं| मिहिरकुल तोरमाण के सभी विजय अभियानों हमेशा उसके साथ रहता था। उसके शासन काल के पंद्रहवे वर्ष का एक अभिलेख ग्वालियर एक सूर्य मंदिर से प्राप्त हुआ हैं| इस प्रकार हूणों ने मालवा इलाके में अपनी स्थति मज़बूत कर ली थी| उसने उत्तर भारत की विजय को पूर्ण किया और गुप्तो सी भी नजराना वसूल किया| मिहिरकुल ने पंजाब स्थित स्यालकोट को अपनी राजधानी बनाया|मिहिकुल हूण एक कट्टर शैव था। उसने अपने शासन काल में हजारों शिव मंदिर बनवाये| मंदसोर अभिलेख के अनुसार यशोधर्मन से युद्ध होने से पूर्व उसने भगवान स्थाणु (शिव) के अलावा किसी अन्य के सामने अपना सर नहीं झुकाया था। मिहिरकुल ने ग्वालियर अभिलेख में भी अपने को शिव भक्त कहा हैं| मिहिरकुल के सिक्कों पर जयतु वृष लिखा हैं जिसका अर्थ हैं- जय नंदी| वृष शिव कि सवारी हैं जिसका मिथकीय नाम नंदी हैं| जैन ग्रन्थ कुवयमाल के अनुसार तोरमाण चंद्रभागा नदी के किनारे स्थित पवैय्या  नगरी से भारत पर शासन करता था| यह पवैय्या नगरी ग्वालियर के पास स्थित थी| जिसमे मिहिर गुल के ग्वालियर प्रस्सति अभिलेख में समस्त विवरण १. [*][*ज](य)ति जलदवालध्वान्तम् उत्सारयन् स्वैःकिरणनिवहजालैर् व्योम विद्योतयद्भिःउ[*दय-गिरितटाग्रं] मण्डय{+न्} यस्तुरंगैःचकितगमनखेदभ्रान्तचंचत्सटान्तैः। उदयगिरि

२. [⏑--](ग्र)स्तचक्रो र्त्तिहर्त्ताभुवनभवनदीपः शर्व्वरीनाशहेतुःतपितकनकवर्ण्णैर् अंशुभिf पंकजानामभिनवरमणीयं यो (वि)धत्ते स वो व्याट्।श्रीतोरमाण इति यः प्रथितो

३. [*?भू-च](?क्र)पः प्रभूतगुणःसत्यप्रदानशौर्याद् येन मही न्यायत(शा)स्तातस्योदितकुलकीर्त्तेः पुत्रो तुलविक्रमः पतिः पृथ्व्याःमिहिरकुलेति ख्यातो भंगो यः पशुपति(म् अ)[आर्रयार्रय्

४. [*तस्मिन् रा]जनि शासति पृथ्वीं पृथुविमललोचने र्त्तिहरेअभिवर्द्धमानराज्ये पंचदशाब्दे नृपवृषस्य।शशिरश्मिहासविकसितकुमुदोत्पलगन्धशीतलामोदेकार्त्तिकमासे प्राप्त गगन

५. [*?पतौ] निर्मले भाति।द्विजगणमुख्यैर् अभिसंस्तुते च पुण्याहनादघोषेणतिथिनक्षत्रमुहूर्त्ते संप्राप्ते सुप्रशस्तद्(इ)ने।मातृतुलस्य तु पौत्रः पुत्रश् च तथैव मातृदासस्यनाम्ना च मातृचेतः पर्व्व-

६. [*त][-⏑][*?पु](र)वास्(त्)अव्(य्)अःनानाधातुविचित्रे गोपाह्वयनाम्नि भूधरे रम्येकारितवान् शैलमयं भानोः प्रासादवरमुख्यं।पुण्याभिवृद्धिहेतोर् म्मातापित्रोस् तथात्मनश् चैववसता च गिरिवरे स्मि राज्ञः

७. [...](?पा)देनये कारयन्ति भानोश् चन्द्रांशुसमप्रभं गृहप्रवरंतेषां वासः स्वर्ग्गे यावत्कल्पक्षयो भवति॥भक्त्या रवेर् व्विरचितं सद्धर्म्मख्यापनं सुकीर्त्तिमयंनाम्ना च केशवेति प्रथितेन च{-।}

८. [...](?दि)त्येन॥यावच्छर्व्वजटाकलापगहने विद्योतते चन्द्रमादिव्यस्त्रीचरणैर् व्विभूषिततटो यावच् च मेरुर् नगःयावच् चोरसि नीलनीरदनिभे विष्णुर् व्विभर्त्य् उज्वलांश्रीं{-स्} तावद् गिरिमूर्ध्नि तिष्ठति

९. [*?शिला-प्रा]सादमुख्यो रमे॥ ग्वालियर क्षेत्र में हूणों का आधिपत्य था| हूण सम्राट मिहिरकुल के शासन काल के पंद्रहवे वर्ष का एक अभिलेखग्वालियर के पास से एक सूर्य मंदिर से प्राप्त हुआ हैं| ग्वालियर जिले की डबरा तहसील में भारस हूण गुर्जरों का प्रमुख गाँव हैं| आज भी चंबल संभागग्वालियर तथा इसके समीपवर्ती जिलो के गुर्जर बाहुल्य अनेक गाँवो में हूण गुर्जरों की बिखरी  आबादी हैं| ग्वालियर की डबरा तहसील में भारस हूण गुर्जरों का मुख्य गाँव हैं| भरास के पास ही चपराना गुर्जरों का बडेरा गाँव हैं| दोनों गोंवो के लोग पग-पलटा भाई माने जाते हैं तथा आपस में शादी नहीं करते| मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में नरवर के पास डोंगरी, और टिकटोली हूण गुर्जरों का प्रसिद्ध गाँव हैं|  शेष अगले भाग में जारी............।

गुर्जर सम्राट मिहिर भोज

सदी के गुमनाम महानायक मिहिर भोज !

सदी के गुमनाम महानायक मिहिर भोज !
मिहिर भोज ,महाराष्ट्र गुर्जर समाज
लेखिका -ज्योति नरेंद्र पाटिल समाजसेवी
एक हज़ार साल आर्यव्रत पर राज करने बाले गुर्जरों में एक से बढ़कर एक राजा महाराजा क्रांतिकारी हुए हैं , जिन्होंने खून पसीने से देश दुनिया की भूमि को रहने योग्य बनाया था जिसमे बीहड़ उबड़ खाबड़ जमीनों को उपयोगी बनाने के लिए गुर्जरों ने पूरे एक हज़ार साल के लगभग राज किया जिनमें हर एक गोत्र के गुर्जरों का अत्यधिक योगदान रहा है शक कुसान हुण मोरी गुर्जर प्रतिहार चालुक्य भड़ाना खटाना घुरैया और बैसला आदि ने राज किया है जिन्होंने भारत को ज्ञान तथा शिक्षा में सात वे आसमान पर पहुँचा दिया था ,गुर्जरों के हर एक राजवंश में शिक्षा को काफी जोर दिया तथा अंधकार को दूर करने में आडम्बर को मिटाने ने के लिए काफी हद तक सफलता शक और कुशाण को हासिल भी रही थी गुर्जर सम्राट मिहिर भोज का नाम भारत ही नही आर्यवृत के महान सम्मानों में गिना जाता है इसके अतिरिक्त प्रभास ,परमेश्वर, श्रीमदादिवरह उपाधियां से गुर्जर सम्राट की सोभा भारत के चक्रबर्ती सम्राट अशोक महान , कनिष्क महान गुर्जर के बाद गुर्जर  सम्राट मिहिर भोज का नाम आता है ,गुर्जर प्रतिहार वंश की स्थापना नागभट्ट नामक एक सामन्त ने 725 ई. में की थी। उसने राम के भाई लक्ष्मण को अपना पूर्वज बताते हुए अपने वंश को सूर्यवंश की शाखा सिद्ध किया। अधिकतर गुर्जर सूर्यवंश का होना सिद्द करते है तथा गुर्जरो के शिलालेखो पर अंकित सूर्यदेव की कलाकृर्तिया भी इनके सूर्यवंशी होने की पुष्टि करती है।आज भी राजस्थान में गुर्जर सम्मान से मिहिर कहे जाते हैं, जिसका अर्थ सूर्य होता है गुर्जर सम्राट मिहिर भोज से अरब , पाल ,कश्मीर के वर्मन वंशी आदि थर-थर कांपते थे !
मिहिर भोज के पहले राज्य स्थिति-
वत्सराज का उत्तराधिकारी नागभट्ट द्वितीय (800-834) भी अपने कुल का एक प्रतापी सम्राट् था। नागभट्ट को अपने सैन्य-जीवन के प्रारम्भ में कई सफलतायें प्राप्त हुई। नागभट्ट-द्वितीय को इस बात के लिए श्रेय प्रदान किया जाता है कि उसने उत्तर में सिन्ध से लेकर दक्षिण में आन्ध्र और पश्चिम में अनर्त (काठियावाड़ में एक स्थान) से लेकर पूर्व में बंगाल की सीमाओं तक अपने राज्य का विस्तार किया। यद्यपि राष्ट्रकूट वंश के राजा गोविन्द तृतीय ने नागभट्ट-द्वितीय को पराजित कर दिया तथापि कन्नौज पर प्रतिहार वंश का अधिकार बना रहा। नागभट्ट-द्वितीय को गोविन्द-तृतीय द्वारा पराजय सहन करने से कुछ हानि अवश्य उठानी पडी किन्तु कन्नौज को उसने अपने हाथ से नहीं जाने दिया और इसे अपनी राजधानी बनाया। नागभट्ट-द्वितीय का उत्तराधिकारी रामभद्र था (834-840), जिसके शासन-काल में कोई महत्त्वपूर्ण घटना घटित नहीं हुई।
रामभद्र के समय गुर्जर राजाओं से गुजरात,मुंगेर , भोजपुर ,पंजाब,आदि राज्य लगभग लगभग नाम मात्र के अधीन थे जिसमें विद्रोह के स्वर गूंज रहे थे

मिहिर भोज का साम्राज्य-
गुर्जर साम्राज्य 

मिहिर भोज के समय गुर्जर वंश का चौमुखी विकाश हुआ था जिसमे गुर्जर सम्राट मिहिर भोज के राज्य शीमा मुल्तान ,सिंध से लेकर बंगाल तक जा लगी और पंजाब और कश्मीर की सरहद से लेके महाराष्ट्र तक जा चुकी थी इसके अलावा मुंगेर, आसाम , उड़ीसा,उत्तराखण्ड आदि इनके साम्राज्य का हिस्सा बन गए थे ।

मिहिर भोज की उपाधियां-गुर्जर सम्राट मिहिर भोज के मुख्य मुख्य अभिलेखों में ग्वालियर, पेहोवा, दौलतपुर, अभिलेख हैं जिनमे मिहिर भोज के नाम के साथ मिहिर,भोज देव, प्रभाश, आदिवराह, परमेश्वर, आदि महान महान उपाधियों से बिभुसित किया गया था ।

मिहिर भोज का पारिवारिक विवरण-

1-नागभट्ट (730-760 ईसवी),
2-ककुस्थ और देवशक्ति (760-778इस्वी) ,
3-वत्सराज (778-800इस्वी ) ,
4-नागभट्ट 2 (800-833इस्वी ) ,
5-रामभद्र (833-835इस्वी ) ,
6- सम्राट मिहिर भोज(835-889 इस्वी)
7-सम्राट महेन्द्रपाल प्रथम(885-910इस्वी) ,
8- सम्राट महिपाल (910-930इस्वी),
9-भोज द्वतीय (930-931),
10-विनायकपाल (931-944इस्वी),
11-महेन्द्रपाल द्वतीय (944-947ई.),
12-देवपाल (947-955इस्वी),
13-विजयपाल(955-985इस्वी),
14-राज्यपाल देव गुर्जर(985-1019),
15-त्रिलोचलपाल गुर्जर(1019-1030इस्वी),
16-यशपाल गुर्जर (1030-1040इस्वी ),  कुल 300 साल आर्यवृत पर गुर्जर वंश के इस परिवार ने राज किया था

मिहिर भोज के सामन्त-

1-चाटसु के गुहिल,
2-शाकंभरी के चाहमान ,
3-मारवाड़ के प्रतिहार ,
4-प्रताप गढ़ के चौहमान ,
5-सौराष्ट्र के चालुक्य ,
6-बुंदेलखंड के चंदेल गुर्जर ,

मिहिर भोज का शासन काल-भोज ने सर्वप्रथम कन्नौज राज्य की व्यवस्था को चुस्त-दुरूस्त किया, प्रजा पर अत्याचार करने वाले सामंतों और रिश्वत खाने वाले कामचोर कर्मचारियों को कठोर रूप से दण्डित किया। व्यापार और कृषि कार्य को इतनी सुविधाएं प्रदान की गई कि सारा साम्राज्य धनधान्य से लहलहा उठा। मिहिरभोज ने गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य को धन, वैभव से चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया। अपने उत्कर्ष काल में इन्हे गुर्जर सम्राट मिहिर भोज की उपाधि मिली थी। अनेक काव्यों एवं इतिहास में उसे गुर्जर सम्राट भोज, भोजराज, वाराहवतार, परम भट्टारक, महाराजाधिराज आदि विशेषणों से वर्णित किया गया है।विश्व की सुगठित और विशालतम सेना भोज की थी-इसमें 8,00,000 से  ज्यादा पैदल करीब 90,000 घुडसवार,, हजारों हाथी और हजारों रथ थे।915 ईस्वीं में भारत आए बगदाद के इतिहासकार अल- मसूदी ने अपनी किताब मरूजुल महान मेें भी मिहिर भोज की 36 लाख सेनिको की पराक्रमी सेना के बारे में लिखा है। इनकी राजशाही का निशान “वराह” था और मुस्लिम आक्रमणकारियों के मन में इतनी भय थी कि वे वराह यानि सूअर से नफरत करते थे। मिहिर भोज की सेना में सभी वर्ग एवं जातियों के लोगो ने राष्ट्र की रक्षा के लिए हथियार उठाये और इस्लामिक आक्रान्ताओं से लड़ाईयाँ लड़ी।मिहिरभोज के राज्य में सोना और चांदी सड़कों पर विखरा था-किन्तु चोरी-डकैती का भय किसी को नहीं था। जरा हर्षवर्धन के राज्यकाल से तुलना करिए। हर्षवर्धन के राज्य में लोग घरों में ताले नहीं लगाते थे,पर मिहिर भोज के राज्य में खुली जगहों में भी चोरी की आशंका नहीं रहती थी। मिहिर भोज की सेना में हर जाति वर्ग का इंसान सेना में लड़ने जाता था जिसमे तमोली, तेली, माला बुनकर, लुहार, आदि सभी भाग लेते थे भोज के राज कॉज में अरब यात्री ने भोज के राज्य का वर्णन में लिखता है कि "इस राजा के राज्य में सुकून से जीते थे और अपने घरों में ताला नही लगाते थे" मिहिर भोज ने अपनी सेना को पहले से और बेहत्तर बनाने के लिए सेना की टुकड़ियों को अलग अलग दिशाओं में राष्ट्रकूट से लड़ने के लिए चुंगी मांडू पुर बना दी थी , पाल से लड़ने के लिए मुंगेर सरहद पर, कश्मीर के वर्तमान वंसज से लड़ने के लिए पेहोवा में बना दी थी , अरब के तरफ से होने बाले हमलों की मिहिर भोज अपनी अगुवाई में खुद अंजाम देते थे इनके बारे में कहा गया था कि ये "अरब यात्री सुलेमान और मसूदी ने अपने यात्रा विवरण में लिखा है ’जिनका नाम बराह (मिहिर भोज) है। उसके राज्य में चोर डाकू का भय कतई नहीं है। उसकी राजधानी कन्नौज भारत का प्रमुख नगर है जिसमें 7 किले और दस हजार मंदिर है। आदि बराह का (विष्णु) का अवतार माना जाता है। यह इसलाम धर्म और अरबों का सबसे बड़ा शत्रु है"

अरबों के साथ संघर्ष -मिहिर भोज के राजतिलक के बाद अरबों के ऊपर अंधकार के काले बादल छगये थे जिसके चलते राज्य के विरोध अरब आक्रमण कारी अरमान ने दुगनी फ़ौज का उपयोग किया 839 इस्वी में और सिंध में बुरी तरह उसको पराजित होकर भागना पड़ा  अरब के खलीफा मौतसिम वासिक, मुत्वक्कल, मुन्तशिर, मौतमिदादी थे। अरब के खलीफा ने इमरान बिन मूसा को सिन्ध के उस इलाके पर शासक नियुक्त किया था। जिस पर अरबों का अधिकार रह गया था लेकिन इनकी मोत के बाद अरमान गद्दी पर आया और गुर्जर के हातो पराजित होकर सिंध से बेदखल होकर भाग गया मिहिर भोज ने इसी प्रकार 840 से 885 तक इनको 20 बार युद्ध के मैदान में बुरी तरह पराजित कर के अपने राज्य तथा राज्य के लोगों  को बचाया नारायण का अवतार की तरह ।

पाल वांशियों के साथ संघर्ष - पाल वंश में धर्म पाल ,नारायण पाल ,देबपाल में साथ मिहिर भोज के काफी युद्ध हुए देबपाल तथा नारायण पाल की सत्ता पूर्ण खत्म करके बंगाल उड़ीसा को अपने मे मिला लिया था ।

राष्ट्रकूटों के साथ संघर्ष- अमोघवर्ष ,तथा उसके पुत्र के साथ निरंतर युद्ध उज्जैन तथा कन्नौज के लिए किए जा रहे थे कृष्ण 2 को युद्ध से हरा कन्नौज से बेदखल कर दिया था इसके इससे पहले नर्मदा तट पर हुए मिहिर भोज और अमोघवर्ष के साथ हुए युद्ध अनिर्णायक रहे थे ।


मिहिर भोज के सिक्के- 
श्रीमद आदिवराह 

मिहिर भोज के कन्नौज विजय के बाद राजतिलक में निसानी के तौर पर श्रीमद आदिवराह नामक 56 ग्रेन के सिक्के को चलाया था जो उस जमाने का उत्तम टकसाल थी जिसका उपयोग सैनिक वेतन ,बाजार व्यवस्ता आदि के लिए किया जाता था 


मिहिर भोज की कला -
तेली का मंदिर ग्वालियर
मिहिर भोज ने विंष्णु ,शिव,के मंदिर सबसे ज्यादा बन बाए थे जिनमें ,बटेस्वर मुरैना,तेलीका मन्दिर, सास बहू का मंदिर ,
चतुर्भुज मंदिर, जयपुर दोसा की बाबड़ी, आदि मंदिरों का निर्माण कराया था ।मिहिर भोज ने भारत भूमि के उत्तम स्थान आर्यवृत पर लगभग 55साल राज किया तथा गुर्जर प्रतिहार के इस वंश ने भारत भूमि का भोग 300 साल तक किया जिसमें भारत को सोने की चिड़िया बना दिया गया था ।
मिहिर भोज अपने दरबार मे एक एक श्लोक पर लाख लाख मुद्रा भेंट करता था राज्य की विशालता आप नाप सकते हैं कि मिहिर भोज का राज्य किस शिखर पर था आज उस महान सम्राट की जयंती तथा अवतरण दिवश है जिसपे कम से कम हम उनके आदर्शों पर चल कर हम भी जीवन की कठिनता को पार करके अपना कर्तिमान कायम कर सकते हैं जिसके लिए हिम्मत ,संयम आदि की जरूरत होती है ।
हर हर भोज
घर घर भोज
जय कनिष्क जय मिहिरगुल जय भोज ।

बलराम गुर्जर राजगढ़

 गुर्जर गौरव पूर्व विधायक श्री बलराम गुर्जर जी को जन्म दिन की लाखों बधाई भगवान उनको लंबी उम्र दे इनके पुत्र श्री जसवंत सिंह जी सामाजिकता के दायरे में पूर्व विधायक श्री बलराम जी गायरी गुर्जर ओर लोर गुर्जरों का एरिया है जिसके आस पास काफी ज्यादा मात्रा में गुर्जर हैं 
पूर्व विधायक श्री बलराम 
आज 18/11/18 को बलराम जी का जन्म दिन है । पूर्व विधायक श्री बलराम जी हर वर्ष राजगढ़ और ब्यावरा के गुर्जरों की एक यात्रा निकलते है जिसको बलराम जी या उनके पुत्र वर्तमान राज्यमंत्री श्री जसवंत सिंह गुर्जर देव भगवान की शोभा यात्रा में शामिल होते हैं , इसके साथ ही समाज की आवाज बनते हैं, पिता और पुत्र इसे अतिरिक्त बालराम जी पूर्व विधयक भी राजगढ़ से बने थे औरा उनके पुत्र जिला पंचायत प्रधान हैं ।।

Saturday, 17 November 2018

गूजरी भाषा का इतिहाश

गुजरी भाषा व्याखया -
लेखक -इंजी. राम प्रताप सिंह
कुषाणोँ ने बैक्ट्रीया पर अधिकार किया उसे समय ऊधर ग्रीक सभ्यता तथा लिपी ज्यादा मात्रा मे उपस्थित थी क्योंकि की ग्रीकों के अधीन यह जगह काफी समय सै थी जब कुषाणोँ ने अधिकार किया तो इनकी भाषा की जगह पर आर्य भाषा को लाये जबकी प्रारम्भिक समय मे ईधर खरोष्टी भाषा ही ग्रीक  लिपी मै चलती थी ज्यादा जिसके कुछ समय बाद यह बख्त्री भाषा का उपयोग होने लगा जंहा तक है रोबोटक अभिलेक के अनुसार इनके नामो के वर्णन मे "ओ" को ज्यादा महत्वदिया गया है जिसमे हम इस बात को देखते हैं की यह लोग बोलते कैसे थे उस समय Ozeno (Ujjain), Kozambo (Kausambi), Zagedo (Saketa), Palabotro (Pataliputra) and Ziri-Tambo (Janjgir(ship)-Champa). तथा कनिंघम के अनुसार जिस सिक्के पर कोर्स लिखा है अगर उसे गोर्स (गोर्सी) पढना चाहिये तो kus(a^-)na तो k=G, Gus(a^-)NA इसी क्रम मै आगे इनके सिक्कों पर तथा बी.ऐन.मुख़र्जी के अनुसारKomaro (Kumara) and called Maaseno (Mahasena) and called Bizago (Visakha), Narasao और Miro (Mihara). आदि शब्द इनके सिक्कों पर मिलते हैं जिनके अनुसार वासुदेव को वाजुदेव पढना चाहिये तथा स/श की जगह पर ये लोग "ज" का उपयोग करते थे अब हम कुसान/कुषान पर ध्यान देते हैं "क" को जब कनिंघम ने "ग" बताया है तब आगे "गुजान"(Gujan) जो की गूजर शब्द कि ही अप्रभंस है Komaro (Kumara) and called Maaseno (Mahasena) and called Bizago (Visakha), Narasao और Miro (Mihara). आदि शब्द इनके सिक्कों पर मिलते हैं जिनके अनुसार वासुदेव को वाजुदेव पढना चाहिये तथा स/श की जगह पर ये लोग "ज" का उपयोग करते थे अब हम कुसान/कुषान पर ध्यान देते हैं "क" को जब कनिंघम ने "ग" बताया है तब आगे "गुजान"(Gujan) जो की गूजर शब्द कि ही अप्रभंस है।जी. ए. ग्रीयरसन ने लिंगविस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया, खंड IX  भाग IV में गूजरी भाषा का का विस्तृत वर्णन किया हैं| गूजरों की भाषा गूजरी के बारे मे लिखने बाले सर डेन्जिल इबटसन ने कास्ट एन्ड ट्राइब्स आफ दी पिपुल (पंजाब कास्टस) 1883’’ इनकी भाषा पंजाबी तथा पश्तो सै बिल्कुल भिन्न हिन्दी है जो नरम जुबानी है "इसी भाषा को पूंछ ऐवटाबाद मे बोली जाती है जिसको नरम भाषा गूजरी कहते हैं यही भाषा अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान के सीमा प्रान्त इलाकों मे बहुतायात मे बोली जाती है यह क्षेत्र गुर्जरो के ही अधीन रहा है चाहे वो कसाणा /कुषाण हों या उनके वशंज खटाना या प्रतिहार हों लेकिन इतिहासकारों के अनुसार हूंणों के आगमन के समय इस भाषा का चलन कहा गया है जबकी इसका सम्बन्ध तो बख्त्री सै मिलते हैं | जाहीर  सी बात हे की कुसन वंश के बाद भारत में किसी भी  नयी जाती का आगमन नहीं हुआ हे जिस ने खुद की कोई संस्कृति का विकाश किया हो लेकिन वो सिरफ कुसन वंश ने किया था  जिस का जीता जगता सबूत उनकी भाषा तथा उनके अभिलेख मूर्तिकला आदि भारत में ज़िंदा हैं जिस से इस  का पता लगता हे की यह राजवंश  अपने समय में तररक्कि के किस पथ पे गमन कर रहा था लेकिन गुजरी भाषा के जो प्रमाड कुषाणों के समय में मिलते हैं वो किसी भी समय में नहीं मिलते हैं कुसनो के बाद सबसे बड़ा माइग्रेशन हूणों  का हुआ जिन की कोई भासा नहीं थी अगर हूडों की कोई भाषा होती तो माना जा सकता था की कुसन काल की भासा का इनके साथ कुछ मिलावट होसकती थी मगर ऐसा नहीं हुआ आज भी हम देखें तो कुसन और हूँड़ों के राज करने की जो रियासतें थीं उनमे मूलरूप से गुजरी भाषा का ही चलना हे उत्तरप्रदेश के गुर्जर बहुल एरिया में आज  भी राम राम को रोम रोम बोलै जाता हे,ओ को कॉमन कर के बोलै जाता हे जब आज कुषाण राजवंश को ख़त्म हुए    २००० वर्ष हो चुके हैं लेकिन हमारे लोगों की आज भी वोही भासा हे |  वैसे ही गूजरी बोली  में राम को रोम, पानी को पोनी, गाम को गोम, गया को गयो आदि बोला जाता हैं|इसी  भासा में कुसानो के सिक्कों   उन्हें बाख्त्री में कोशानो लिखा हैं और वर्तमान में गूजरी में  भी ओ को अतिरिक्त जोड़ के  कोसानो बोला जाता हौं| अतः कुषाणों द्वारा प्रयुक्त बाख्त्री भाषा और आधुनिक गूजरी भाषा की समानता भी कुषाणों और गूजरों की एकता को प्रमाणित करती हैं| ​
गुर्जरों की हमेशा ही अपनी विशिष्ट भाषा रही हैं| गूजरी भाषा के अस्तित्व के प्रमाण सातवी शताब्दी से प्राप्त होने लगते हैं| सातवी शताब्दी में राजस्थान को गुर्जर देश कहते थे, जहाँ गुर्जर अपनी राजधानी भीनमाल से यहाँ शासन करते थे| गुर्जर देश के लोगो की अपनी गुर्जरी भाषा और विशिष्ट संस्कृति थी| इस बात के पुख्ता प्रमाण हैं कि आधुनिक गुजराती और राजस्थानी का विकास इसी गुर्जरी अपभ्रंश से हुआ हैं| वर्तमान में जम्मू और काश्मीर के गुर्जरों में यह भाषा शुद्ध रूप में बोली जाती हैं|  जी. ए. ग्रीयरसन ने लिंगविस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया, खंड IX  भाग IV में गूजरी भाषा का का विस्तृत वर्णन किया हैं| इतिहासकारों के अनुसार कुषाण यू ची कबीलो में से एक थे, जिनकी भाषा तोखारी थी| तोखारी भारोपीय समूह की केंटूम वर्ग की भाषा थी| किन्तु बक्ट्रिया में बसने के बाद इन्होने मध्य इरानी समूह की एक भाषा को अपना लिया| इतिहासकारों ने इस भाषा को बाख्त्री भाषा कहा हैं| कुषाणों द्वारा बोले जाने वाली बाख्त्री भाषा और गुर्जरों की गूजरी बोली में खास समानता हैं| कुषाणों द्वारा बाख्त्री भाषा का प्रयोग कनिष्क के रबाटक और अन्य अभिलेखों में किया गया हैं| कुषाणों के सिक्को पर केवल बाख्त्री भाषा का यूनानी लिपि में प्रयोग किया गया हैं| कुषाणों द्वारा प्रयुक्त बाख्त्री भाषा में गूजरी बोली की तरह अधिकांश शब्दों में विशेषकर उनके अंत में ओ का उच्चारण होता हैं| जैसे बाख्त्री में उमा को ओमो, कुमार को कोमारो ओर मिहिर को मीरो लिखा गया हैं, वैसे ही गूजरी बोली  में राम को रोम, पानी को पोनी, गाम को गोम, गया को गयो आदि बोला जाता हैं| इसीलिए कुषाणों के सिक्को पर उन्हें बाख्त्री में कोशानो लिखा हैं और वर्तमान में गूजरी में कोसानो बोला जाता हौं| अतः कुषाणों द्वारा प्रयुक्त बाख्त्री भाषा और आधुनिक गूजरी भाषा की समानता भी कुषाणों और गूजरों की एकता को प्रमाणित करती हैं| हालाकि बाख्त्री और गूजरी की समानता पर और अधिक शोध कार्य किये जाने की आवशकता हैं, जो कुषाण-गूजर संबंधो पर और अधिक प्रकाश डाल सकता हैं|
Organizations working for Gojri:
Tribal Research and Cultural Foundation PoonchGurjar Desh Charitable Trust JammuAnjmun Gujjran SrinagarJammu and Kashmir Anjuman Taraqi Gojri Adab RajouriBhartya Gurjar Pareshad Uatter Pradesh.Anjuman Gojri Zuban-o-Adab Tral KashmirOrganisation of Himalyan Gujjars PoonchAdbi Sangat Wangat KashmirAdbi Majlis Gojri JammuSarwari Memorial Gojri Society JammuGojri Dramatic Club JammuGujjar Writers Association Uri Baramulla.Gojri Anjumun BadgamGujjar Manch KathuaBazm-i-Adab Kalakote RajouriGojri Development Center Karnah KupwaraHalqa.e.Gojari Adab GilgitBazm-e-Gojri, Pakistan (Rawalpindi/islamabad)

महाराष्ट्र गुर्जर वंश

महराष्ट्र में गुर्जर भूमिका 
लेखक- इंजी. राम प्रताप सिंह
गुर्जर गौरव महान पराक्रमी सर सेनापति प्रताप राव गुर्जर स्मारक 
महाराष्ट्र एक गुर्जरों का प्रमुख गढ़ है ये हमारे समाज की एजुकेशन का पिछड़ापन है कि अपने लोगो को भाइयों को पहचान नही पा रहे हैं और आपसी भाईचारे की जगह ऊंच नीच का भेद भरके बैठे हैं । इसको मिटाने के लिए हमे सबसे आगे आना पड़ेगा हमने प्रथम इस्वी से लेकर आज तक अपना खून बहाया है   हमने अरब से हुए हैं हमले या फिर अंग्रेजों के या फिर मुग़लों के हमले को मुह तोड़ जबाब दिया था, महारष्ट्र के विशाल साम्राज्य को स्थापित करने के लिए भी खून बहाया है जिसको हम जग जाहीर वीर सर सेनापति प्रताप राव गुर्जर के नामसे जानते हैं , गुर्जरों में असंख्य  कुल बन गए हैं जिसने हमे आपस मे  बांट के रखा है हमारी विशाल वीर जाती का इतिहास भारत ही नही मध्य एशिया , उज्बेकिस्तान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, ईरान को ग़ुलाम बनाने बाले महान कुषाण  चक्रबर्ती सम्राट कनिष्क ने भी महराष्ट्र पे सासन किया गुज्जरी भासा को उद्गम तथा उपयोग को बढ़ावा दिया जिनके वंश ने भारत पे 350 साल राज किया तथा राजयस्थन ,मध्य प्रदेस जम्मू ,कश्मीर पाकिस्तान अफगानिस्तान, में आज भी उनके वंश से निकले गोत्र के लोग रहते हैं जिनमे , दोरात मुंडन, मंदार, अधाना, अन्नान, बर्गटदेवड़ा/दीवड़ा: गुर्जरों की इस खाप के गाँव गंगा जमुना के ऊपरी दोआब के मुज़फ्फरनगर क्षेत्र में हैं| कैम्पबेल ने भीनमाल नामक अपने लेख में देवड़ा को कुषाण सम्राट कनिष्क की देवपुत्र उपाधि से जोड़ा हैं|
गुर्जरी माता जानकी बाई
दीपे/दापा: गुर्जरों की इस खाप की आबादी कल्शान और देवड़ा खाप के साथ ही मिलती हैं तथा तीनो खाप अपने को एक ही मानती हैं| शादी-ब्याह में खाप के बाहर करने के नियम का पालन करते वक्त तीनो आपस में विवाह भी नहीं करते हैं और आपस में भाई माने जाते हैं| संभवतः अन्य दोनों की तरह इनका सम्बन्ध भी कुषाण परिसंघ से हैं, इसके बाद भारत वर्ष में गुर्जरों की सत्ता हुण वंश के रूप में मिहिर गुल हुण और तोरमाण हुण के शासन के अधीन आई जिनके गोत्र के लोग आज महराष्ट्र से लेके जम्मू उत्तर प्रदेश तक गुर्जरों में मिलते हैं, जिनसे ही निकले दोड़े गुर्जरों हैं जिनमे  हूण गोत्र हैं| खानदेश गजेटियर के अनुसार दोड़े गुर्जरों के 41 कुल हैं| इनमे से एक अखिलगढ़ के हूण हैं|इसके बाद भारत के महान वंश के कुल आये जिनको इतिहाश में गुर्जर प्रतिहार के नाम से जाना गया जिन्होंने अरबों को 300 साल तक हराये हिंदुत्व की कल्पना करने बाले लोग आज भारत मे ही नही होते अगर गुर्जर प्रतिहार न होते आज भारत भी मुस्लिम देश हो जाता इस बात को हम नही पत्थर चीख चीख के बोलते हैं राज्यस्थान के जिसमे रेगिस्तान में हमारे पूर्वजों ने अपने खून से रेत को लाल किया और देश को संभाल के बचाया था जिनको आज इतिहाश में लगा तार कहीं कहीं  इतिहाशकर प्रयत्न किए जाते हैं ये हमारे लोगों की अज्ञानता है कि उनको अपने कुल वंश का कुछ समझ नही आता जे महान चक्रबर्ती सम्राट मिहिर भोज को जानना चाहिए हमारे लोगों को  जिन्होंने भारत पर अखंड 55साल राज किया था लेकिन आज हमारी हालात सबके सामने है ।।इसके अतिरिक्त हिंदी भाषी मध्य प्रदेश के इन्दोर संभाग में भी लेवा गूजर मिलते हैं| होशंगाबाद में इन्हें मून्डले या रेवे गूजर कहते हैं| खानदेश गजेटियर के अनुसार रेवा गूजर और गुजरात के लेवा गूजर एक ही हैं इसके साथ ही
 श्री पी के अन्ना पाटिल साहब 
 प्रताप राव का वास्तविक नाम कड़तो जी गूजर था, प्रताप राव की उपाधि उसे शिवाजी ने सरेनौबत (प्रधान सेनापति) का पद प्रदान करते समय दी थी। प्रताप का अर्थ होता है- वीर। एक अन्य मत के अनुसार यह उपाधि शिवाजी ने उसे मिर्जा राजा जय सिंह के विरूद्ध युद्ध में दिखाई गई वीरता के कारण सम्मान में दी थी। प्रताप राव गूजर ने अपने सैनिक जीवन का प्रारम्भ शिवाजी की फौज में एक मामूली गुप्तचर के रूप में किया था। एक बार शिवाजी वेश बदल कर सीमा पार करने लगे, तो प्रताप राव ने उन्हें ललकार कर रोक लिया, शिवाजी ने उसकी परीक्षा लेने के लिए भांति-भांति के प्रलोभन दिये, परन्तु प्रताप राव टस से मस नहीं हुआ। शिवाजी प्रताप राव की ईमानदारी, और कर्तव्य परायणता से बेहद प्रसन्न हुए। अपने गुणों और शौर्य सेवाओं के फलस्वरूप सफलता की सीढ़ी चढ़ता गया शीघ्र ही राजगढ़ छावनी का सूबेदार बन गया। 6 सैनिकों ने प्रताप राव का अनुसरण किया, वे बहुत साहस और वीरता से लड़े परन्तु शत्रु की विशाल सेना के मुकाबले लड़ते हुए सात वीर क्या कर सकते थे। अंतत: वे सभी वीरगति को प्राप्त हो गये। प्रताप राव की मृत्यु का सबसे अधिक दु:ख शिवाजी को हुआ। शिवाजी ने महसूस किया कि उन्होंने अपने बहादुर और वि’वसनीय सेनापति को खो दिया। प्रताप राव के परिवार से सदा के लिये नाता बनाए रखने के लिए उन्होंने अपने पुत्र राजाराम का विवाह उसकी पुत्री के साथ कर दिया। प्रताप राव गूजर और उसके छह साथियों के बलिदान की यह घटना मराठा इतिहास की सबसे वीरतापूर्ण घटनाओं में से एक है। प्रतापराव और उसके साथियों इस दुस्साहिक बलिदान पर प्रसिद्ध कवि कुसुमग राज ने ‘वीदात मराठे वीर दुआदले सात’ नामक कविता लिखी है जिसे प्रसिद्ध पा’र्व गायिका लता मंगेश्वर ने गाया है। प्रताप राव गूजर के बलिदान स्थल नैसरी, कोल्हापुर, महाराष्ट्र में उनकी याद में एक स्मारक भी बना हुआ है।  शिवाजी के कार्यकाल की सबसे भीषण और आमने-सामने की लड़ाई में मुगलों को सलहेरी के युद्ध में बुरी तरह परास्त करने का श्रेय भी प्रताप राव गूजर को ही प्राप्त है। हिन्दी स्वराज्य की खातिर उसने अपने प्राणों की बाजी लगाकर मुगल सेनापति जय सिंह को उसी के शिविर में हमला कर मारने का प्रयास किया। प्रताप राव गूजर अपनी अंतिम सांस तक हिन्दवी स्वराज्य के लिए संघर्षरत रहा और शिवाजी के राज्याभिषेक की तारीख 15जून 1674 से मात्र तीन माह दस दिन पहले पांच मार्च 1674 को जैसरी के युद्ध में शहीद हो गया। प्रताप राव गूजर जैसे  वीर, साहसी और देशभक्त बिरले ही होते हैं। वास्तव में वह उस तत्व का बना था जिससे शहीद बनते हैं। हिन्दवी स्वराज्य की राह में उसका बलिदान स्मरणीय तथ्य है।  गुर्जर माता जानकी बाई सहयोगनी तथा मराठा राजवंश में गुर्जरी जानकी बाई और तारा बाई महाराज राजा राम जी की पत्नी थी तारा बाई मराठा राण वंश में एक प्रमुख चेहरा हैं जिनको जाना गया है । इनके अतिरिक्त  जानकी बाई गुर्जरी जो कि सर सेनापति प्रताप राव की पुत्री थी जिसकी शादी राजा राम तथा शिवाजी महाराज के पुत्र से शादी की गई ,  जिनसे जन्मे शिवाजी 2 को राजगद्दी माता तारा बाई ने दिलाई तथा गोद लिया था ।यह रिश्ता है गुर्जर मराठा और कुर्मी का जिसको फिर से एक करना है ।जय माँ तारा बाई जय माँ जानकी बाई की ।।

अफगानिस्तान के गुर्जर कबीले

अफगानिस्तान के गुर्जर कबीले!
लेखक- इंजी.राम प्रताप सिंह
गुर्जर साम्राट कुषाण /कसाना वंशी महराज कनिष्क 
अफगानिस्तान में पहले आर्यों के कबीले आबाद थे और वे बौद्ध धर्म के प्रचार के बाद यह स्थान बौद्धों का गढ़ बन गया। यहां के सभी लोग ध्यान और रहस्य की खोज में लग गए। इधर की जमीन पर अत्यधिक मात्रा में प्रथम दल आर्यों का फिर शक कुसान हुन गुज्जर आकर रहने लगे जिसमे से अधिकतर लोग सूर्य अग्नि चन्द्र की पूजा करते थे ।बुद्ध धर्म मे महायान और हीनयान बन ने के बाद इधर बहुतायत में धार्मिक जीवन मे बदलाव आया ।जो गुज्जर इधर से निकले वो काफी ज्यादा मात्रा में थे शीत प्रदेश की बजह से काफी लोग 3000 साल पहले ही रुक गए जिसमे असंख्य कबिले थे ,आज भी अफगानिस्थान के अंदर 500से ज्यादा स्थानों के नाम गुर्जरों के ऊपर हैं जिनमे गुर्जर नाला ,गुज्जर खान,गुज्जर बाग, गुज्जर घर, आदि स्थान हैं अफगानिस्थान के राष्ट्रगान में भी गुर्जरो का विवरण नश्ल में किया गया है जो उधर ऊपरी दोआब में मौजूद है अफगानिस्तान के राष्ट्रगान का विवरण कुछ इस प्रकार है
"अरबों की और गुज्जरों की,
पामिरियों, नूरिस्तानीयों
ब्राहुइयों की और किज़िलबाशों की,
एमाक्यों और पाशाइयों की भी"
इस्लाम के आगमन के बाद यहां एक नई क्रांति की शुरुआत हुई। बुद्ध के शांति के मार्ग को छोड़कर ये लोग क्रांति के मार्ग पर चल पड़े। शीतयुद्ध के दौरान अफगानिस्तान को तहस-नहस कर दिया गया। यहां की संस्कृति और प्राचीन धर्म के चिह्न मिटा दिए गए। लेकिन धर्म बदलने के बाद भी आज तक ये लोग "ये माना पंथ बदला है मगर पुरखे नही बदले "की कहावत को सच साबित करते हैं क्यों कि आज भी
अफगानिस्तान के गांवों में बच्चों के नाम आपको कनिष्क, आर्यन, वेद ,मिहिर, जयपाल, साही, देबपुत्र आदि नाम  मिलेंगे।दरअसल, अंग्रेजी शासन में पिंडारियों के रूप में जो अंग्रेजों से लड़े, वे विशेषकर पठान  गुज्जर और जाट  ही थे। पठान जाट और गुज्जरों  के समुदाय का ही एक वर्ग है। कुछ लोग इन्हें बनी इसराइलियों का वंशज मानते हैं जो की बेबुनियाद है पठानों में गुज्जरों की सबसे ज्यादा चौहान, कुषाण, हुन आदि की बदली हुई है जिसमे आज भी खटानाओ के राजधानी थी पुरातत्वविदों ने खैबर पख्तूनख्वाह के हुंद गांव में और खुदाई की मांग की है  हुन्द हुन का ही बदला स्वरूप है जिसको आज भी अफगनिस्तान से लेकर भारत तक गुर्जरों का राजवंशी गोत्र है तथा आज भी संख्या बल में ज्यादा है पुरातत्व वेदियों ने माग की ताकि उस समय की सभ्यता को समझा जा सकें। हुंद को हिंदू शाही वंश की राजधानी कहा जाता है। हुंद खैबर पख्तूनख्वाह में सबसे समृद्ध पुरातात्विक स्थल है और कहा जाता है कि सिंकदर महान तक्षशिला को जीतने से पहले हुंद में ही रुका था।  अफगनिस्तान पे पररम्भ से इस्वी पूर्व के लगभग 200साल पहले से गुर्जरों ने राज करना पररम्भ कर दिया था जिसमे कुषाण ,तुअर, खटाने आदि शामिल थे आज भी स्वात घाटी के महराज खटाने वंश के बालिये स्वात के नाम से जाना जाता है ।आजकल हम जिस बगराम हवाई अड्डे का नाम बहुत सुनते हैं, वह कभी कुषाणों की राजधानी था। उसका नाम था कपीसी।

पुले-खुमरी से 16 किमी उत्तर में सुर्ख कोतल नामक जगह में कनिष्क-काल के भव्य खंडहर अब भी देखे जा सकते हैं। इन्हें आजकल ‘कुहना मस्जिद' के नाम से जाना जाता है। पेशावर और लाहौर के संग्रहालयों में इस काल की विलक्षण कलाकृतियां अब भी सुरक्षित हैं।अफगानिस्तान के बामियान, जलालाबाद, बगराम, काबुल, बल्ख आदि स्थानों में अनेक मूर्तियों, स्तूपों, संघारामों, विश्वविद्यालयों और मंदिरों के अवशेष मिलते हैं। काबुल के आसामाई मंदिर को 2,000 साल पुराना बताया जाता है। आसामाई पहाड़ पर खड़ी पत्थर की दीवार को ‘हिन्दूशाहों' द्वारा निर्मित परकोटे के रूप में देखा जाता।         है।  जिन नदियों को आजकल हम आमू, काबुल, कुर्रम, रंगा, गोमल, हरिरुद आदि नामों से जानते हैं, उन्हें प्राचीन भारतीय लोग क्रमश: वक्षु, कुभा, कुरम, रसा, गोमती, हर्यू या सर्यू के नाम से जानते थे।

जिन स्थानों के नाम आजकल काबुल, कंधार, बल्ख, वाखान, बगराम, पामीर, बदख्शां, पेशावर, स्वात, चारसद्दा आदि हैं, उन्हें संस्कृत और प्राकृत-पालि साहित्य में क्रमश: कुभा या कुहका, गंधार, बाल्हीक, वोक्काण, कपिशा, मेरू, कम्बोज, पुरुषपुर (पेशावर), सुवास्तु, पुष्कलावती आदि के नाम से जाना जाता था   अंतिम हिन्दूशाही राजवंश :
सन् 843 ईस्वी में कल्लार नामक राजा ने हिन्दूशाही की स्थापना की। तत्कालीन सिक्कों से पता चलता है कि कल्लार के पहले भी रुतविल या रणथल, स्पालपति और लगतुरमान नामक हिन्दू या बौद्घ राजाओं का गांधार प्रदेश में राज था। ये स्वयं को कनिष्क का वंशज भी मानते थे।
अफगानिस्तान के आर्य नस्लीय मुस्लिम गुर्जर 
हिन्दू राजाओं को ‘काबुलशाह' या ‘महाराज धर्मपति' साही वंश ,देबपुत्र ,कहा जाता था। इन राजाओं में कल्लार, सामंतदेव खटाना, भीम खटाना, अष्टपाल खटाना, जयपाल खटाना, आनंदपाल खटाना, त्रिलोचनपाल खटाना, भीमपाल खटाना,आदि उल्लेखनीय हैं।
इन राजाओं ने लगभग 350 साल तक अरब आततायियों और लुटेरों को जबर्दस्त टक्कर दी और उन्हें सिंधु नदी पार करके भारत में नहीं घुसने दिया, लेकिन 1019 में महमूद गजनी से त्रिलोचनपाल की हार के साथ अफगानिस्तान का इतिहास पलटी खा गया।चीनी यात्री युवानच्वांग ने इस्लाम व अफगानिस्तान के बौद्धकाल का इतिहास लिखा है। गौतम बुद्ध अफगानिस्तान में लगभग 6 माह ठहरे थे। बौद्धकाल में अफगानिस्तान की राजधानी बामियान हुआ करती थी। प्रमुख गुर्जर कबीले जो बाद में गोत्र में परिवर्तित हुए हैं -चेची: प्राचीन चीनी इतिहासकारों के अनुसार बैक्ट्रिया आगमन से पहले कुषाण परिसंघ की भाई-बंद खापे और कबीले यूची कहलाते थे| वास्तव में यूची भी भाई-बंद खापो और कबीलों का परिसंघ था, जोकि अपनी शासक परिवार अथवा खाप के नाम पर यूची कहलाता था| बैक्ट्रिया में शासक परिवार या खाप कुषाण हो जाने पर यूची परिसंघ कुषाण कहलाने लगा ।गोर्सी: एलेग्जेंडर कनिंघम के अनुसार कुषाणों के सिक्को पर कुषाण को कोर्स अथवा गोर्स भी पढ़ा जा सकता हैं| उनका कहना हैं गोर्स से ही गोर्सी बना हैं| गोर्सी गोत्र भी अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत में मिलता हैं|खटाना: संख्या और क्षेत्र विस्तार की दृष्टी से खटाना गुर्जरों का एक राजसी गोत्र हैं| अफगानिस्तान में यह एक प्रमुख गुर्जर गोत्र हैं| पाकिस्तान स्थित झेलम गुजरात में खाटाना सामाजिक और और आर्थिक बहुत ही मज़बूत हैं| पाकिस्तान के गुर्जरों में यह परंपरा हैं कि हिन्द शाही वंश के राजा जयपाल और आनंदपाल खटाना थे।नेकाड़ी: राजस्थान के गुर्जरों में नेकाड़ी धार्मिक दृष्टी से पवित्रतम गोत्र माना जाता हैं| अफगानिस्तान और भारत में नेकाड़ी गोत्र पाया जाता हैं।बरगट: बरगट गोत्र अफगानिस्तान और भारत के राजस्थान इलाके में पाया जाता हैं|कसाना: अलेक्जेंडर कनिंघम ने आर्केलोजिकल सर्वे रिपोर्ट, खंड IV, 1864 में कुषाणों की पहचान आधुनिक गुर्जरों से की है| अपनी इस धारणा के पक्ष में कहते हैं कि आधुनिक गुर्जरों का कसाना गोत्र कुषाणों का प्रतिनिधि हैं| अलेक्जेंडर कनिंघम बात का महत्व इस बात से और बढ़ जाता है कि गुर्जरों का कसाना गोत्र क्षेत्र विस्तार एवं संख्याबल की दृष्टि से सबसे बड़ा है। कसाना गौत्र अफगानिस्तान से महाराष्ट्र तक फैला हुआ है| कसानो के सम्बंध में पूर्व में ही काफी कहा चुका हैं|कपासिया: गुर्जरों की कपासिया खाप का निकास कुषाणों की राजधानी कपिशा (बेग्राम) से प्रतीत होता हैं|बैंसला: गुर्जरों की बैंसला खाप का नाम संभवतः कुषाण सम्राट की उपाधि से आया हैं| कुषाण सम्राट कुजुल कडफिस ने ‘बैंसिलिओस’ (Basileos) उपाधि धारण की थी| कनिष्क ने यूनानी उपाधि ‘बैसिलिअस बैंसिलोंन’ (Basileus Basileon) धारण की थी, जिसका अर्थ हैं राजाओ का राजा (King of King)|हरषाना, सिरान्धना, करहाना, रजाना, फागना, महाना, अमाना, करहाना, अहमाना, चपराना/चापराना, रियाना, अवाना, चांदना आदि| संख्या बल की दृष्टी से ये गुर्जरों के बड़े गोत्र हैं| सभवतः इन सभी खापो का सम्बन्ध कुषाण परिसंघ से रहा हैं इनके अतिरिक्त कुछ प्रमुख गोत्र हकला , कामर, फामडा , चौहान, सोलंकी, तूर, तुअर, हुण, हरहुन, हुग, गोचर, पोसवाल,मोटला, छाबड़ा,मिलू, आदि मौजूद हैैं.